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Saturday, September 19, 2026

सावन के अंतिम सोमवार को गुप्त काशी में हर हर महादेव की रही गूंज

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—-अंतिम सोमवार को डाक बम  के मद्देनजर शिव भक्त पूरे कांवड़ यात्रा के रास्ते पर फल,पानी,दवा आदि सामग्री का किया वितरण

सोनभद्र। शिवद्वार कांवर यात्रा, जिसे आमतौर पर कांवड़ यात्रा के नाम से जाना जाता है, भगवान शिव के भक्तों द्वारा की जाने वाली एक वार्षिक तीर्थयात्रा है। यह यात्रा विशेष रूप से हिंदू कैलेंडर के श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) में आयोजित होती है और उत्तर भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय है। इस यात्रा में शिव भक्त, जिन्हें कांवड़िया या भोले कहा जाता है, पवित्र गंगा नदी से जल लेकर अपने स्थानीय शिव मंदिरों या प्रमुख शिव मंदिरों जैसे काशी विश्वनाथ (वाराणसी), बैद्यनाथ (देवघर), या नीलकंठ महादेव में जलाभिषेक करते हैं। सोनभद्र में कांवड़िये प्रसिद्ध ऐतिहासिक विजयगढ़ पर स्थित पवित्र राम सरोवर से जल लेकर वहां से लगभग 80 किलोमीटर की यात्रा कर घोरावल के शिवद्वार में स्थित भगवान शिव के अति प्राचीन मंदिर में जलाभिषेक करते हैं।

कांवर यात्रा की प्रमुख विशेषताएं:

  1. उद्देश्य:
  1. प्रमुख स्थल:
  • कांवड़िए हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख (उत्तराखंड), और सुल्तानगंज (बिहार) जैसे पवित्र स्थलों से गंगाजल लाते हैं।
  • जल को कांवड़ (बांस के डंडे पर लटके दो पात्रों) में भरकर पैदल लाया जाता है, जो सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा हो सकती है।
  1.   परंपराएं और नियम:
  1. ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व:
  1. सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:
  • यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक भी है। मार्ग में शिविर लगाए जाते हैं, जहां भोजन, पानी, और चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।
  • यात्रा के दौरान “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयकारे गूंजते हैं, जो भक्ति और उत्साह का माहौल बनाते हैं।
  1. आधुनिक बदलाव:

शिवद्वार कांवर यात्रा भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति और तपस्या का प्रतीक है। यह न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि सामाजिक सरोकारों और जल संरक्षण जैसे पर्यावरणीय संदेशों को भी प्रोत्साहित करती है।

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