Sonbhadra news। जिले के शिक्षा विभाग में इन दिनों एक नई कार्यशैली चर्चा का विषय बनी हुई है। आरोप है कि बेसिक शिक्षा विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने-अपने “कारखास” नियुक्त कर रखे हैं और बिना उनकी सहमति के विभागीय स्तर पर कोई भी कार्य आगे नहीं बढ़ता। “कारखास” शब्द प्रायः पुलिस विभाग से जोड़ा जाता रहा है, जहां अधिकारियों के नजदीकी कुछ कर्मचारी अनौपचारिक रूप से प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं, किंतु अब यही प्रवृत्ति शिक्षा विभाग में भी जड़ें जमाती दिखाई दे रही है।
विद्यालय से अधिक ‘साहब’ के साथ सक्रिय
विभागीय सूत्रों के अनुसार, कुछ कथित कारखास कर्मचारी अपने मूल विद्यालयों में शायद ही कभी दिखाई देते हों, लेकिन विभागीय कार्यालयों और अधिकारियों के साथ उनकी सक्रियता बनी रहती है। आरोप है कि यदि कोई कर्मचारी इनके विरुद्ध शिकायत करता है, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। उक्त कर्मचारियों की कार्यशैली की शिकायत करने पर शिकायतकर्ताओं के निलंबन, दूरस्थ ब्लॉकों में संबद्धीकरण (अटैचमेंट) और कड़ी चेतावनियों की घटनाएं विभाग में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

नगवा ब्लॉक में एआरपी पद पर नियुक्ति पर उठते सवाल
मामला विशेष रूप से नगवा ब्लॉक में एआरपी (अकादमिक रिसोर्स पर्सन) पद पर हुई एक नियुक्ति को लेकर चर्चायें आम हो चुका है अधिकारियों ने उक्त कारखास को बचाने के लिए सारे नियम कानून ताक पर रख दिया है। जानकारी के अनुसार, विभाग द्वारा जारी एआरपी पद पर नियुक्ति विज्ञापन में स्पष्ट शर्त थी कि आवेदन करने वाला शिक्षक विज्ञापन प्रकाशन की तिथि तक कम से कम पांच वर्ष की नियमित सेवा पूर्ण कर चुका हो। विभागीय जानकारों का दावा है कि संबंधित कर्मचारी की सेवा अवधि उस समय मात्र चार वर्ष नौ माह थी, अर्थात वह निर्धारित पात्रता पूरी नहीं करता था। इसके बावजूद उसे एआरपी पद पर चयनित कर नियुक्ति दे दी गई। आरोप है कि यह चयन नियमों की अनदेखी कर विशेष कृपा के तहत किया गया।

शिकायत के बाद कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति, जांच पर सन्नाटा
बताया जाता है कि इस नियुक्ति के विरुद्ध एक कर्मचारी ने उच्चाधिकारियों से शिकायत की, जिस पर जांच भी बैठाई गई। हालांकि, शिकायत दर्ज कराने वाले कर्मचारियों के विरुद्ध ही त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर अन्य ब्लॉकों में संबद्ध कर दिया गया। सूत्रों का कहना है कि उन्हें यह भी चेतावनी दी गई कि यदि “व्यवहार” में सुधार नहीं हुआ तो सेवा से बर्खास्तगी तक की कार्रवाई हो सकती है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि जांच बैठी थी तो उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ? क्या रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, या जांच प्रक्रिया अब भी लंबित है? यदि जांच पूरी हुई, तो पात्रता अधूरी होने के बावजूद चयन को किस आधार पर वैध ठहराया गया?

विभाग में बढ़ती ‘सांठ-गांठ’ की संस्कृति की संस्कृति से शिक्षा का हो रहा बंटाधार
इन घटनाओं के बाद विभागीय कर्मचारियों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि बिना प्रभावशाली कारखासों से तालमेल बिठाए काम कर पाना कठिन है। कई कर्मचारी पहले संबंधित “कारखास” से संपर्क साधते हैं, उसके बाद ही अधिकारी तक अपनी बात पहुंचाते हैं। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता और कार्यसंस्कृति पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।

शिक्षा व्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षा विभाग जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नियमों से समझौता कर व्यक्तिगत निकटता को प्राथमिकता दी जाएगी, तो इसका सीधा असर शैक्षणिक गुणवत्ता और छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा।.जब शिक्षा के मंदिर ही अनियमितताओं और पक्षपात के आरोपों से घिरने लगें, तो यह केवल एक नियुक्ति का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करता है।
अब देखना यह होगा कि संबंधित उच्चाधिकारी इस प्रकरण में पारदर्शी जांच सुनिश्चित कर सच्चाई सामने लाते हैं या यह मामला भी समय के साथ फाइलों में दबकर रह जाएगा।



