—जिले में जनवरी के शून्य से अगस्त में 111 पहुंची मरीजों की संख्या, मलेरिया निरीक्षकों की कमी और गैर-कैडर कार्यों में लगाए जाने पर अपर निदेशक ने जताई नाराजगी
—-अपर निदेशक मलेरिया एवं वीबीडीटीओ का पत्र: मूल पद के सापेक्ष ही लिया जाए काम, दूसरे पटल का कार्य कराने पर तत्काल रोक के निर्देश
जिला संवाददाता
जिले में मलेरिया का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। आंकड़े इसकी गंभीरता की गवाही दे रहे हैं। जनवरी में जहां मलेरिया का एक भी मरीज सामने नहीं आया था, वहीं अगस्त आते-आते मरीजों की संख्या बढ़कर 111 पहुंच गई। फरवरी और मार्च में दो-दो, अप्रैल में चार, मई में पांच, जून में 20 और जुलाई में 29 मरीज सामने आने के बाद अगस्त में आंकड़े में अचानक भारी उछाल ने स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक ओर मच्छरजनित बीमारी मलेरिया धीरे-धीरे पैर पसार रही है, वहीं दूसरी ओर जिस विभाग पर इसकी निगरानी, जांच, पहचान और रोकथाम की जिम्मेदारी है, वहां कर्मचारियों की कमी और उन्हें उनके मूल कार्य से इतर लगाए जाने का मामला सामने आया है। मलेरिया एवं वीबीडीटीओ के अपर निदेशक कार्यालय से जारी एक पत्र ने भी इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
अपर निदेशक के पत्र ने खोली विभागीय व्यवस्था की पोल
अपर निदेशक, मलेरिया एवं वीबीडीटीओ, उत्तर प्रदेश, लखनऊ की ओर से मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि मलेरिया/फाइलेरिया संवर्ग के कर्मचारियों से उनके मूल पद के सापेक्ष कार्य न लेते हुए अन्य पटल से संबंधित कार्य लिया जा रहा है। पत्र में इसे “अत्यन्त खेदजनक व जनहित के विपरीत” स्थिति बताया गया है।

पत्र में चिकित्सा अनुभाग-5 के शासन पत्र का हवाला देते हुए कहा गया है कि मलेरिया/फाइलेरिया संवर्ग के कर्मचारियों की कमी/अनुपलब्धता के कारण मलेरिया, डेंगू जैसे रोगों के प्रकोप की खबरें छपती रहती हैं, जिससे आम जनमानस में विभाग की छवि प्रभावित होती है।
अपर निदेशक ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि नियंत्रणाधीन मलेरिया/फाइलेरिया संवर्ग के कर्मचारियों के कार्यों की समीक्षा कर यह सुनिश्चित किया जाए कि उनसे उनके मूल पद के सापेक्ष ही कार्य लिया जा रहा है। यदि उनसे दूसरे पटल का कोई कार्य कराया जा रहा है तो उन्हें तत्काल उन कार्यों से अलग करते हुए उनके मूल पद का कार्य संपादित कराया जाए।
पत्र में निर्देशों के अनुपालन की आख्या भी मांगी गई है।
आंकड़े बता रहे हैं कि स्थिति कितनी गंभीर है
जिले में मलेरिया मरीजों की संख्या का महीना-दर-महीना आंकड़ा देखें तो तस्वीर चिंताजनक है—
माह मलेरिया मरीज
जनवरी 0
फरवरी 2
मार्च 2
अप्रैल 4
मई 5
जून 20
जुलाई 29
अगस्त 111
यानी जनवरी के शून्य से अगस्त में मरीजों की संख्या 111 तक पहुंचना महज सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं माना जा सकता। खासकर जून के बाद जिस गति से मामले बढ़े हैं, उसने जिले में मलेरिया नियंत्रण की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दस ब्लाक, लेकिन निगरानी व्यवस्था कितनी मजबूत?
जिले में कुल 10 ब्लाक हैं। इनमें आठ पुराने ब्लाक हैं, जबकि दो नए ब्लाकों का गठन किया गया है। मलेरिया नियंत्रण के लिहाज से प्रत्येक ब्लाक में मलेरिया निरीक्षक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनका दायित्व केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं बल्कि मलेरिया तथा अन्य वेक्टर जनित बीमारियों की स्थिति पर निगरानी, संदिग्ध मामलों की जांच-पहचान, बीमारी के स्रोत की जानकारी और रोकथाम के उपायों से जुड़ा है।
ऐसे में यदि किसी ब्लाक में मलेरिया निरीक्षक का पद खाली हो, कर्मचारी उपलब्ध न हो या उपलब्ध कर्मचारी को उसके मूल कार्य से हटाकर दूसरे काम में लगा दिया जाए तो इसका सीधा असर बीमारी की निगरानी और नियंत्रण व्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है।
और यही बात अब विभाग के उच्चाधिकारियों के पत्र में भी सामने आई है।
एक निरीक्षक के वर्षों से गायब होने का भी दावा
मामला यहीं खत्म नहीं होता। विभागीय व्यवस्था को लेकर यह भी दावा किया जा रहा है कि जिले में तैनात एक मलेरिया निरीक्षक लंबे समय से अपने कार्यस्थल से अनुपस्थित है। बताया जा रहा है कि इस संबंध में स्वयं मुख्य चिकित्सा अधिकारी की ओर से शासन को पत्र भेजकर स्थिति से अवगत कराया जा चुका है।

यदि यह दावा सही है तो सवाल यह है कि वर्षों से किसी कर्मचारी के कार्यस्थल से अनुपस्थित रहने के बावजूद उसके विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी? बीमारी के बढ़ते मामलों के बीच फील्ड स्तर पर उसकी अनुपस्थिति की भरपाई किस व्यवस्था से की जा रही है?
दूसरे निरीक्षक पर भी गंभीर आरोप, पूर्व जिलाधिकारी के पत्र का हवाला
वहीं एक अन्य मलेरिया निरीक्षक को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पूर्व जिलाधिकारी द्वारा शासन को भेजे गए पत्र में आरोप लगाया गया था कि संबंधित कर्मचारी अपने तैनाती स्थल पर नियमित रूप से नहीं जाते और मुख्य चिकित्सा अधिकारी के बंगले अथवा कार्यालय के आसपास रहते हैं।

यह भी आरोप लगाया गया था कि वे शासन द्वारा सौंपे गए कार्यों के बजाय सीएमओ कार्यालय में बाबू का कार्य करते हैं और अधीनस्थ कर्मचारियों से कथित रूप से उत्कोच प्राप्त करते हैं। इन आरोपों के आधार पर पूर्व जिलाधिकारी द्वारा शासन को उनके स्थानांतरण के लिए डीओ लेटर लिखे जाने की बात भी सामने आ रही है।
सवाल यह कि फिर मलेरिया नियंत्रण कौन करेगा?
मलेरिया नियंत्रण की पूरी व्यवस्था का आधार फील्ड निगरानी है। बीमारी कहां फैल रही है, किन क्षेत्रों में मच्छरों का प्रजनन अधिक है, कितने संदिग्ध मरीज हैं, जांच कितनी हुई और संक्रमित मरीज मिलने पर तत्काल क्या कार्रवाई की गई—इन सभी गतिविधियों में फील्ड स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
ऐसे में जब मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही हो और उसी समय विभागीय स्तर पर यह पत्र जारी होकर यह कहना पड़े कि मलेरिया/फाइलेरिया संवर्ग के कर्मचारियों से उनके मूल कार्य के बजाय दूसरे पटल का कार्य लिया जा रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बीमारी को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों से उनका मूल काम कब कराया जाएगा?

“हाथ बंधे हैं” तो आखिर बांध कौन रहा है?
स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से जब इस तरह की व्यवस्थाओं पर सवाल किया जाता है तो अक्सर जवाब मिलता है कि उनके “हाथ बंधे हैं”। लेकिन जनता का सवाल इससे भी बड़ा है—अगर अधिकारियों के हाथ बंधे हैं तो उन्हें बांध किसने रखा है?
क्या किसी कर्मचारी की पहुंच इतनी मजबूत हो सकती है कि शासन के निर्देश, विभागीय जिम्मेदारियां और बीमारी के बढ़ते आंकड़े भी उसके सामने बेअसर हो जाएं?
क्या किसी कर्मचारी को उसके मूल दायित्व से हटाकर दूसरे काम में लगाने की कोई ऐसी व्यवस्था है, जिसके चलते फील्ड में मलेरिया नियंत्रण प्रभावित हो?
और यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ वर्षों से शिकायतें हैं तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
“देश जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था” जैसी स्थिति तो नहीं?
मौजूदा हालात पर यह पुरानी कहावत याद आती है—”देश जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था।”
यहां स्थिति भी कुछ ऐसी ही नजर आती है। जिले में मलेरिया के मरीजों का आंकड़ा लगातार ऊपर जा रहा है, अगस्त में संख्या 111 तक पहुंच चुकी है, वहीं विभागीय स्तर पर कर्मचारियों के मूल कार्य से हटाए जाने को लेकर उच्चाधिकारी को पत्र जारी करना पड़ रहा है।
यानी एक तरफ बीमारी बढ़ रही है और दूसरी तरफ व्यवस्था इस बात में उलझी दिखाई दे रही है कि कौन कर्मचारी किस पटल पर काम कर रहा है।
अब जिम्मेदारी तय करने का समय
मलेरिया के मामले बढ़ने को केवल मौसम या मच्छरों की बढ़ती संख्या के हवाले से छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। बीमारी की रोकथाम के लिए जिम्मेदार तंत्र की भी समीक्षा होनी चाहिए।
कौन-कौन से ब्लाक में मलेरिया निरीक्षक तैनात हैं?
कितने निरीक्षक नियमित रूप से फील्ड में जा रहे हैं?
कितने कर्मचारियों को उनके मूल कार्य से हटाकर दूसरे पटल पर लगाया गया है?
कितने निरीक्षक लंबे समय से अनुपस्थित हैं?
उनके खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई?
और अगस्त में 111 मरीज मिलने के बाद बीमारी की रोकथाम के लिए क्या विशेष अभियान चलाया गया?
इन सवालों के जवाब जनता को मिलना जरूरी हैं।
क्योंकि मलेरिया की रोकथाम चिट्ठियों से नहीं, समय पर जांच, सक्रिय फील्ड निगरानी, दवा, मच्छर नियंत्रण और जवाबदेही से होगी।
अपर निदेशक का पत्र कम से कम इतना तो साफ कर ही रहा है कि विभाग के उच्च स्तर पर भी इस बात की जानकारी पहुंच चुकी है कि मलेरिया/फाइलेरिया संवर्ग के कर्मचारियों का इस्तेमाल उनके मूल दायित्व के बजाय दूसरे कार्यों में किया जा रहा है। अब देखना यह है कि इस पत्र के बाद वास्तव में व्यवस्था सुधरती है या फिर एक और चिट्ठी फाइलों में दबकर रह जाती है।
जनता का सीधा सवाल है—मलेरिया बढ़ने के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है और बीमारी से लड़ने वाले हाथों को बांधने वालों पर कार्रवाई कब होगी?



