लखनऊ/सोनभद्र।
उत्तर प्रदेश के परिवहन विभाग में एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोपों ने शासन-प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश कार्य समिति सदस्य अनिल द्विवेदी द्वारा एआरटीओ प्रवर्तन सोनभद्र राजेश्वर यादव के खिलाफ की गई शिकायत के बाद लखनऊ से सोनभद्र तक प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। मामला सीधे परिवहन विभाग की प्रमुख सचिव अर्चना अग्रवाल तक पहुँचने के बाद सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सोनभद्र जनपद में बालू, गिट्टी और राखण का परिवहन करने वाले वाहनों से एंट्री फीस के नाम पर लंबे समय से अवैध वसूली की जा रही है। आरोपों के अनुसार प्रति वाहन 5 हजार से 10 हजार रुपये और कुछ मामलों में 25 हजार रुपये प्रतिमाह तक की वसूली तय है। यह वसूली कथित रूप से बिना किसी वैधानिक आदेश के, खुलेआम और संगठित तरीके से की जा रही है।

इस मामले ने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा कर दिया है कि यदि ऐसी गतिविधियाँ लंबे समय से चल रही थीं तो अब तक प्रशासन की नजर क्यों नहीं पड़ी? क्या निचले स्तर से लेकर ऊपर तक सिस्टम की आँखों पर पट्टी बंधी हुई थी या फिर सब कुछ जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा था? यही कारण है कि यह खबर अब केवल एक अधिकारी तक सीमित न रहकर पूरे सिस्टम पर प्रहार बन चुकी है।
अनिल द्विवेदी का कहना है कि अवैध वसूली से न केवल व्यापारियों का शोषण हो रहा है बल्कि सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। साथ ही आय से अधिक संपत्ति का सवाल भी गंभीर रूप से उठाया गया है। शिकायत में बैंक खातों, चल-अचल संपत्तियों और कथित वसूली तंत्र की निष्पक्ष जाँच की मांग की गई है।

सूत्रों के मुताबिक, शिकायत सामने आने के बाद शासन स्तर पर फाइलें हरकत में आ चुकी हैं। प्रमुख सचिव परिवहन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तरीय जाँच का आश्वासन दिया है। माना जा रहा है कि यदि निष्पक्ष जाँच होती है तो यह मामला केवल सोनभद्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगाएगा।
अब सवाल यह है कि क्या यह खबर वाकई शासन-प्रशासन की कुम्भकर्णी नींद तोड़ पाएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। जनता की निगाहें अब लखनऊ पर टिकी हैं, जहाँ से यह तय होगा कि सिस्टम खुद को बचाएगा या भ्रष्टाचार पर निर्णायक वार करेगा।



