अंकुश द्विवेदी
प्रयागराज । बिहार में सितंबर 2026 के दौरान आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर गंगा के मैदानी क्षेत्रों की बाड़-संवेदनशीलता और प्रभावी आपदा प्रबंधन की आवश्यकता को उजागर किया है। इसी संदर्भ में प्रयागराज विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के शोधकर्ता ब्रज किशोर द्विवेदी ने कोसी-गंगा संगम क्षेत्र में बाद के विस्तार का वैज्ञानिक आकलन किया है।
ब्रज किशोर द्विवेदी शोधपत्र "Multi-Temporal Sentinel-1 SAR-Based Assessment of Flood Inundation Expansion in the Kosi-Ganga Confluence Zone, Bihar, India" अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका International Journal of Research and Innovation in Applied Science (IJRIAS) में प्रकाशित हुआ है। उल्लेखनीय है ब्रज किशोर द्विवेदी,प्रो. अजीजुर्रहमान सिद्दीकी नेतृत्व में शोध कर रहे हैं जबकि इसके सह-लेखक विकास सिंह हैं।
उपग्रह चित्रों से सामने आए महत्वपूर्ण निष्कर्ष
अध्ययन में Sentinel-1 Synthetic Aperture Radar (SAR) उपग्रह के 19 अगस्त और 12 सितंबर 2026 के चित्रों का विश्लेषण किया गया। परिणामों के अनुसार, अध्ययन क्षेत्र में मानचित्रित जल एवं बाढ़ क्षेत्रफल 358.09 वर्गकिलोमीटर से बढ़कर 749.52 वर्ग किलोमीटर हो गया। यानी लगभग 391.43 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई, जो प्रारंभिक क्षेत्रफल की तुलना में 109.31 प्रतिशत अधिक है।

नदी-विशिष्ट विश्लेषण में गंगा से संबंधित मानचित्रित क्षेत्र 264.16 से बढ़कर 501.62 वर्ग किलोमीटर हुआ, जबकि कोसी से संबंधित क्षेत्र 93.93 से बढ़कर 247.90 वर्ग किलोमीटर पहुंच गया। इस प्रकार कोसी से संबंधित क्षेत्र में प्रतिशत के आधार पर अधिक वृद्धि दर्ज हुई हालांकि, ये आंकड़े जल क्षेत्र के स्थानिक विस्तार को दर्शाता हैं, न कि सीधे तौर पर प्रभावित परिवारों या आर्थिक क्षति को।
बिहार में बाढ़ की गंभीरता और मानवीय प्रभाव

सितंबर 2026 में विहार के कई जिलों में बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी रही। 11 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 15 जिलों में 46.88 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे। इनमें भागलपुर और कटिहार जैसे जिले भी शामिल थे। राहत एवं बचाव कार्यों के अंतर्गत सामुदाविक रसोई, राहत शिविर, नावों और आपदा प्रतिक्रिया दलों की सहायता ली गई।

9 सितंबर की रिपोर्ट में भागलपुर जिले के सुल्तानगंज में गंगा का जलस्तर 36.80 मीटर दर्ज किया गया, जो 2021 में दर्ज 36.75 मीटर के पिछले उच्चतम बाड़ स्तर से अधिक था। यह स्थिति गंगा के निचले मैदानी क्षेत्रों में बाड़ की गंभीरता को दर्शाती है।
बाढ़ प्रबंधन में भू-स्थानिक तकनीक की भूमिका
शोध में डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) के माध्यम से स्थलाकृति का विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि अपेक्षाकृत निचले बाढ़ मैदानों, विशेषकर दियारा क्षेत्रों में जल का व्यापक विस्तार हुआ। ऐसे क्षेत्र बाढ़ के दौरान विशेष निगरानी की मांग करते हैं।
इस अध्ययन की विशेषता यह है कि Sentinel-1 की रडार तकनीक बादलों की उपस्थिति में भी पृथ्वी की सतह की जानकारी उपलब्ध करा सकती है। मानसून के दौरान लगातार बादल रहने की स्थिति में यह तकनीक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की पहचान के लिए उपयोगी है।
अध्ययन के निष्कर्ष बाद जोखिम मानचित्रण, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, राहत कार्यों की प्राथमिक्ता तय करने और भविष्य की आपदा प्रबंधन योजनाओं के लिए आधारभूत जानकारी प्रदान कर सकते हैं।










