सोनभद्र के साहित्यकार पण्डित वाचस्पति पाठक की इस माह 120 वीं जयंती !
पाठक जी, प्रसाद जी की परम्परा को कथा-साहित्य के क्षेत्र में प्रवर्द्धित करने वाले कथाकार थे। इनकी कहानियों के संग्रह 'द्वादशी' (1932 ई.) और 'प्रदीप' (1936 ई.) हैं। 'द्वादशी' अगोरी-बड़हर के तत्कालीन नरेश शारदामहेशप्रसाद सिंह शाह बहादुर को समर्पित
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डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह
सोनभद्र जनपद की पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों में पण्डित वाचस्पति पाठक (1905 - 1979 ई.) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पाठक जी का पैतृक गाँव अलउर-गुरदह है, जो सोन के किनारे बसा हुआ है। पाठक जी के पिता पण्डित महावीरदत्त पाठक चन्देल राजवंश की पारिवारिक देवी सिद्धेश्वरी के पुजारी थे। आज भी पाठक जी के परिवार के लोग गुरुदह एवं सहुआर में बसे हुए हैं एवं सिद्धेश्वरी देवी की पूजा-अर्चना का दायित्व इन्हीं लोगों के द्वारा पूर्ण होता है।
पाठक जी, प्रसाद जी की परम्परा को कथा-साहित्य के क्षेत्र में प्रवर्द्धित करने वाले कथाकार थे। इनकी कहानियों के संग्रह 'द्वादशी' (1932 ई.) और 'प्रदीप' (1936 ई.) हैं। 'द्वादशी' अगोरी-बड़हर के तत्कालीन नरेश शारदामहेशप्रसाद सिंह शाह बहादुर को समर्पित की गयी है। लेखक के शब्द अविकल रूप में उल्लिखित हैं- 'विद्याविनोदी, प्रजा-प्रिय माननीय राजा श्री शारदा महेश प्रसाद सिंह जी शाह अगोरी-बड़हराधिपति के कर-कमलों में सादर समर्पित।' पाठक जी की ख्याति जहाँ एक कथाकार के रूप में है, वहीं एक श्रेष्ठ सम्पादक, प्रकाशक और 'भारती भण्डार' के व्यवस्थापक के साथ साथ राय कृष्णदास की कला-परम्परा के चित्रों के संग्राहक के रूप में भी है।
पाठक जी ने 'अच्छी कहानियाँ' (1978 ई.) का सम्पादन किया है, जो लोकभारती से प्रकाशित है। इसके अतिरिक्त राय कृष्णदास के साथ 'इक्कीस कहानियाँ' (1972 ई.) और डॉ. उदय नारायण तिवारी के साथ 'नये एकांकी' का सम्पादन किया। प्रारम्भ में पाठक जी कविताएँ लिखा करते थे। बाद में कहानी-लेखन का क्षेत्र प्रबल हो गया, किन्तु उनके काव्य-संस्कार कभी विस्मृत नहीं हुए। 'किन्नरी' नामक कहानी में उन्होंने दो बन्द का एक गीत लिखा है, जिससे उनकी काव्य-प्रतिभा प्रकट होती है।
इस माह पण्डित वाचस्पति पाठक की 120वीं जयन्ती है। इस अवसर पर सोनभद्र की सम्पूर्ण साहित्यिक परम्परा की ओर से पाठक जी की पुनीत स्मृतियों को कोटिशः नमन ।
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