लखनऊ । विशेष गहन पुनरीक्षण (एस आई आर) को रद्द करने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले 20 दिनों से आंदोलन जारी है। कल केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने चुप्पी तोड़ते हुए आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह घुसपैठियों को बचाने के लिए एस आई आर का विरोध कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार भारत से एक-एक घुसपैठिए को बाहर निकालने के लिए प्रतिबद्ध है।
लेकिन सवाल है कि आखिर ये घुसपैठिए हैं कहाँ? सरकार और चुनाव आयोग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने के बाद अब तक कितने घुसपैठियों को चिह्नित कर पाए हैं? कितने लोगों को भारत से बाहर निकालने की कार्रवाई हुई है? इन सवालों का जवाब देने के बजाय पूरी बहस को विपक्ष द्वारा घुसपैठियों को बचाने के आरोप तक सीमित कर दे रही है।
सरकार के दावों की वास्तविकता समझने के लिए एसआईआर के परिणामों पर गौर करना जरूरी है। देश के विभिन्न राज्यों में इस प्रक्रिया के दौरान करोड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। अब चुनाव आयोग स्वयं उन नामों को दोबारा जोड़ने की कवायद में जुटा है। उसकी ओर से लगातार प्रेस विज्ञप्तियाँ जारी की जा रही हैं, जिनमें बताया जाता है कि मतदाता सूची से हटाए गए कितने नाम फिर से जोड़ दिए गए हैं। पश्चिम बंगाल इसका एक उदाहरण है। चुनाव से पहले लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबरें सामने आईं। बाद में चुनाव आयोग ने लगभग 83 लाख नाम फिर से जोड़ने की जानकारी दी। सवाल यह है कि यदि इतनी बड़ी संख्या में हटाए गए लोगों में लाखों के नाम दोबारा जोड़े जा रहे हैं, तो क्या पूरी प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा की गई थी?
अब यह दिन के उजाले की तरह यह साफ हो गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 और रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपुल्स एक्ट के किसी भी प्रावधान में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चलाने का कोई भी अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं था। यही नहीं नए मतदाताओं को जोड़ने के फॉर्म सिक्स में जो बदलाव चुनाव आयोग ने किए थे उसे दो चुनाव आयुक्तों ने अवैधनिक और अनधिकृत बताया और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कह दिया कि उसने इसमें परिवर्तन की कोई अनुमति नही दी है।
दरअसल, एसआईआर की पूरी प्रक्रिया ने भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संविधान निर्माण के समय ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को लोकतंत्र की बुनियाद बनाया गया था। इसका अर्थ था कि राजा हो या रंक, अमीर हो या गरीब, अमीर हो या फकीर प्रत्येक नागरिक के मत का मूल्य समान होगा। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और लिंग के भेद से ऊपर उठकर हर व्यक्ति को समान राजनीतिक अधिकार और नागरिक सम्मान मिलेगा। एक व्यक्ति, एक वोट और एक समान राजनीतिक मूल्य की यही अवधारणा भारतीय लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला है।
आज इसी आधारशिला पर हमला हो रहा है। भाजपा की राजनीति, आरएसएस की विचारधारा और बड़े कॉरपोरेट घरानों के आर्थिक हितों का गठजोड़ इस संवैधानिक लोकतंत्र को खत्म करने पर आमादा है। संविधान के निर्माण के दौर में भी आरएसएस की ओर से संविधान की आलोचना की गई थी। आज संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और सार्वजनिक संपदा खतरे में डाल दी गई है।
पिछले वर्षों में सार्वजनिक संस्थाओं और प्राकृतिक संसाधनों के निजीकरण तथा बड़े कॉरपोरेट घरानों के हाथों में आर्थिक शक्ति के बढ़ते संकेंद्रण ने असमानता को गहरा किया है। सत्ता और पूंजी के इस गठजोड़ के खिलाफ सवाल उठाने वाली आवाजों को कमजोर करना लोकतंत्र के लिए अशुभ है। यदि संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही समाप्त होती है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाली व्यवस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं, तो इसका सबसे अधिक नुकसान गरीबों, मजदूरों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और वंचित समुदायों को उठाना पड़ता है।
एसआईआर के विरोध में जारी आंदोलन पर दिल्ली में जिस तरह की पाबंदियाँ सामने आई हैं, वे भी चिंता का विषय हैं। जंतर-मंतर जैसे पारंपरिक विरोध स्थल को प्रदर्शन करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। उसकी जगह बुराडी जैसे दूरस्थ स्थान दिए गए हैं और रामलीला मैदान में भी बड़ी संख्या में लोगों के कार्यक्रम के लिए भारी शुल्क देना पड़ेगा। ऐसे में आम नागरिकों और जन आंदोलनों के लिए अपनी बात रखना मुश्किल हो जायेगा। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन कोई सरकारी कृपा नहीं, बल्कि नागरिकों की आवाज उठाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। जिसे संविधान के मूल अधिकार में शामिल किया गया है। असहमति का सम्मान स्वस्थ लोकतंत्र का मूल तत्व है।
ओबरा और दुद्धी से एक लाख इक्कीस हजार मतदाताओं के नाम काटे गए
एसआईआर के सवाल पर जारी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि महानगरों में उठ रहे सवाल अभी तक गाँवों और दूरदराज के इलाकों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच पाए हैं। पिछले सप्ताह रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान की ओर से सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली और वाराणसी के गाँवों के दौरे के दौरान यह अनुभव सामने आया कि बड़ी संख्या में ग्रामीणों को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण से उनके नागरिक और राजनीतिक अधिकार किस तरह प्रभावित हो सकते हैं। आदिवासी आरक्षित विधानसभा दुद्धी में 60982 और ओबरा में 60738 नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। बड़े पैमाने पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटने से व्यक्तिगत मताधिकार तो जाता ही है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गहरा असर डालता है।
इसीलिए आज जरूरत है कि इस लड़ाई को केवल दिल्ली और बड़े शहरों के धरना स्थलों, सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित न रखा जाए। इसे गाँवों, कस्बों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और मजदूर बस्तियों तक ले जाना होगा। नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना होगा और चुनाव आयोग व सरकार से पारदर्शिता तथा जवाबदेही की मांग करनी होगी। राजा की जान जिस तोतें में है यानी मोदी सरकार की ताकत जो ग्लोबल फाइनेंस कैपिटल और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के सहयोग से बनी है। उस तोते की प्रभावशाली घेरेबंदी करने की जरूरत है।
रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान की ओर से पूर्वांचल के दस जिलों—सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, बलिया, आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, गाजीपुर और भदोही—में नई पीढ़ी के नौजवान इन सवालों को उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि एसआईआर की प्रक्रिया की रद्द हो, नागरिकों के मताधिकार की गारंटी दी जाए, मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, बढ़ती आर्थिक असमानता पर रोक लगाने के लिए बड़े कॉरपोरेट घरानों की संपत्ति पर प्रभावी कर लगाने की मांग भी उठाई जा रही है।
इसी क्रम में 1-2 नवंबर 2026 को वाराणसी में पूर्वांचल के दस जिलों के नई पीढ़ी के प्रतिनिधियों की दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की जा रही है। इसका उद्देश्य युवाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आर्थिक असमानता और नागरिक अधिकारों के सवालों पर प्रशिक्षित करना तथा इन मुद्दों को जमीनी स्तर पर जनसंवाद का विषय बनाना है।
आज ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सऐप की राजनीति से आगे बढ़ने और जनता के बीच जाकर उसके वास्तविक सवालों पर संवाद विकसित करने की जरूरत है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब नागरिक अपने अधिकारों को समझेंगे और उनके हनन के विरुद्ध संगठित होकर आवाज उठाएँगे।लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई केवल किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं है। यह समान नागरिकता, समान राजनीतिक अधिकार और सामाजिक-आर्थिक न्याय की लड़ाई है।
प्रदेश महासचिव, ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश।






