सोनभद्र में भ्रष्टाचार का गुरुतालाब—जहाँ काग़ज़ों पर गुलाबी मौसम है और धरातल पर सड़ांध…
घोटाले की आग वाली फाइल अधिकारियों की मेज़ों तक तो पहुंचती है पर उन्हें जाँच के नाम पर ऐसा उलझाया जाता है कि जाँच कराने वाले खुद ही ऑफिस ऑफिस घूमते दम तोड़ देते हैं
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सोनभद्र।
पुराने जमाने में किसी शायर ने राजसत्ता पर व्यंग करते हुए एक नज्म लिखी थी जो आज के परिवेश में अपने जिले के सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली पर भी प्रशांगिक लगती है
“तुम्हारे गाँव का मौसम गुलाबी है… काग़ज़ों में हर चीज़ नवाबी है… लेकिन सच?—सच तो वो ज्वाला है जो फाइलों के अंदर सुलगकर गांव की गलियों में या फिर किसी ऑफिस की फाइलो में धुएँ की तरह फैल रही है।”
जिले में भ्रष्टाचार की जड़ें किस हद तक मजबूत हो चुकी हैं, इसका एक बड़ा प्रमाण स्वास्थ विभाग की फाइलो में देखा जा सकता है, जहाँ करोड़ो रूपये के टेंडर प्रक्रिया को संदिग्ध प्रतीत होने के बाद मुख्य विकास अधिकारी जो की जिला स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष के रुप में स्वास्थ्य विभाग द्वारा टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी देख टेंडर प्रक्रिया से जुड़े एक कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही करने का आदेश पारित किया परन्तु उक्त आदेश और उसके बाद महीनों समय गुजरने के बाद भी स्वास्थ विभाग द्वारा उक्त दोषी कर्मचारी पर हुई संदिग्ध प्रशासनिक कार्रवाइयों से मिलता है।
यहाँ आपको बताते चलें की स्वास्थ विभाग(एन एच एम )द्वारा जिले के प्राथमिक स्वास्थ केंद्रों /सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा 100 बेड एम सी एच विंग की साफ सफाई एवं लाण्डरी संचालन हेतु जेम पोर्टल पर 11520000 रूपये (एक करोड़ पंद्रह लाख बीस हजार रूपये ) की निविदा निकाली गई थी। उक्त निविदा को पास करने की प्रक्रिया के दौरान ज़ब जिला स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष के रूप में मुख्य विकास अधिकारी के समक्ष अनुमोदना हेतु रखा गया तो उन्होंने पाया कि टेंडर प्रक्रिया से जुड़े एक कर्मचारी द्वारा टेंडर प्रक्रिया में कुछ ऐसी शर्तो को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है जो कि टेंडर की शर्तों में नहीं थी जिसकी वजह से टेंडर प्रक्रिया में प्रतिभाग करने वाली कुछ फर्मो को परेशानी उठानी पड़ी या यह माना जा सकता है कि कुछ फर्मो को वाक ओवर मिलने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता था ।

उक्त कर्मचारी की इस भ्र्ष्टाचार युक्त कार्यशैली को देखते हुए जिला स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष के रूप में मुख्य विकास अधिकारी द्वारा आदेश दिया गया की उक्त दोषी कर्मचारी को सीएमएसडी स्टोर से हटाते हुए तथा उसका उत्तरदायित्व निर्धारण करते हुए उसके विरुद्ध उचित विभागीय कार्यवाही अमल में लायी जाये।
यहाँ आपको यह भी बताते चलें कि मुख्य विकास अधिकारी द्वारा उक्त दोषी कर्मचारी को मुख्य सीएमएसडी स्टोर से हटाने का यह आदेश 07 अगस्त 2026 को दिया गया था परन्तु उक्त कर्मचारी आज भी उसी कुर्सी पर विराजमान है और जिला स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष के रूप में दिया गया मुख्य विकास अधिकारी का आदेश अब भी फाइलों में धूल फांकते हुए इधर से उधर घूम रहा है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा लांड्री के करोड़ो रूपये के उक्त टेंडर प्रकिया से उक्त फार्माशिस्ट को हटाते हुए एक दूसरे फार्माशिस्ट को नियुक्त करने की बात सामने आ रही है। यदि विभागीय जानकारों की मानें तो करोड़ो रूपये के इस टेंडर प्रक्रिया में नए जुड़ने वाले यह वही फार्माशिस्ट है जिन्हे अपने चाहेतो को टेंडर देने में महारत हासिल है और जानकार तो यहाँ तक कहते है कि कुछ वर्ष पूर्व इन्हें सीएमएसडी स्टोर से इसी लिए हटाया गया था कि इन्होने अपने किसी चहेते को कोई टेंडर देने के लिए फाइलों में बड़े पैमाने पर हेरा फेरी क़ी थी जो पकड़ी गई थी और तब तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारी के हस्तक्षेप के चलते उन्हें सी एम एस डी स्टोर की कुर्सी गवानी पड़ी थी।
वाह रे स्वास्थ्य विभाग क़ी लीला ज़ब कोई उच्चाधिकारी किसी कर्मचारी को दोषी मानते हुए उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संस्तुति करता है तो उसे फाइलों में दबा दिया जाता है। जिन्हें दंड मिलना चाहिए था,उन्हें पुरस्कृत किया जाता है।स्वास्थ्य विभाग का यह निर्णय पूरे जिले में हलचल मचा रहा है।
लोग कह रहे हैं—
“क्या भ्रष्टाचार का इनाम मलाईदार कुर्सी पर तैनाती है? क्या जिलाधिकारी/मुख्य विकास अधिकारी के आदेशों की अनदेखी करने का अधिकार किसी को है?”
सूत्रों की माने तो इसी मुद्दे को लेकर जिलाधिकारी के नाम एक विस्तृत शिकायत पत्र भी दिया गया है, जिसमें गंभीर आरोप हैं कि—
🔹 जिलाधिकारी/मुख्य विकास अधिकारी के आदेशों का अनुपालन अब तक क्यूँ नहीं हुआ।
निलंबन और विभागीय कार्रवाई क़ी फाइल बीच में ही क्यूँ रोक दी गई।
शिकायत पत्र में यह भी कहा गया है कि यह पूरा मामला पारदर्शिता के विरुद्ध है और विभागीय मिलीभगत का बड़ा संकेत देता है। यदि जिलाधिकारी अथवा मुख्य विकास अधिकारी के आदेश ही दरकिनार किए जा रहे हैं, तो नीचे के स्तर पर भ्रष्टाचार का संरक्षण स्पष्ट रूप से झलकता है।
जिले के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, जागरूक नागरिकों तथा ग्रामीणों का कहना है कि सोनभद्र के लगभग सभी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भारी अनियमितताएँ हैं। काग़ज़ों पर सब गुलाबी और चमकदार, जबकि जमीनी हकीकत काली और सड़ी हुई।
अब सवाल उठ रहा है—
क्या सोनभद्र में भ्रष्टाचार इतना शक्तिशाली हो चुका है कि जिलाधिकारी /मुख्य विकास अधिकारी के आदेश भी फीके पड़ जा रहे हैं?
क्या किसी भी सरकारी प्रक्रिया को दूषित कर अपने चहेतो को लाभ पहुंचाने के आरोपी अधिकारी/कर्मचारी को संरक्षण कहां से मिल रहा है?
और क्या करोड़ों की धनराशि का इस तरह से निस्तारण किसी बड़े खेल की तरफ इशारा कर रहा है?
शिकायत में मांगा गया है कि—
• आदेशों की अनुपालन रिपोर्ट तैयार की जाए,
• जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय जांच हो,
• नई तैनाती और आर्थिक लेनदेन की स्वतंत्र जांच कराई जाए,
• और जिले में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें उखाड़ी जाएं।
सोनभद्र के ग्रामीण कहते हैं—स्वास्थ्य केंद्रों की
“साफ-सफाई व लांड्री के लिए हो रहे टेंडर ज़ब , खुद भ्रष्टाचार की गंदगी में डूबे पड़े हैं। अब कार्रवाई नहीं हुई, तो पूरा सिस्टम सड़ जाएगा।”
यह लड़ाई सिर्फ एक विभाग की नहीं, पूरा जिला इस सवाल से जल रहा है।


