Saturday, October 16, 2021
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सत्ता धारी दल के लिए साढ़े चार साल पर साढ़े चार महीने भारी

टूट चुके,गिरे मनोबल व साढ़े चार साल से उपेक्षित कार्यकर्ताओं का मुकाबला मजबूत विपक्षी पार्टियों के जोश से लबरेज सत्ता प्राप्ति के बाद सुनहरे भविष्य के सपने सँजोये कार्यकर्ताओं से होने की वजह से उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में तरह तरह के दांव पेंच व दिलचस्प चुनावी मुकाबला देखने को मिल सकता है

सोनभद्र। विधानसभा चुनाव 2022 का बिगुल बज चुका है।उत्तर प्रदेश में सभी सियासी दल अपने अपने दल के कार्यकर्ताओं को यह संदेश दे रहे हैं कि कार्यकर्ता पूरे मनोयोग से चुनाव की तैयारी में लग जाएं क्योंकि पार्टियों को पता है कि चुनाव कार्यकर्ताओं के दम पर ही जीता जा सकता है। जहॉ तक चुनाव में कार्यकर्ताओं के मनोयोग से चूनावी मैदान में कूदने की बात है तो उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दल को आने वाले साढ़े चार महीने भारी पड़ने वाले हैं क्योंकि साढ़े चार साल तक सत्ता की मलाई काट रहे संगठन के लोगों को अब निचले पायदान पर खड़े अपने नाराज कार्यकर्ताओं के गुस्से से भी निपटने के लिए तैयारी करनी पड़ रही है।

आपको बताते चलें कि सत्ता की इस लड़ाई में सत्ता से बाहर रहने पर पार्टी के मुखिया को केवल अपने कार्यकर्ताओं को केवल सत्ता में आने पर उनके सुनहरे भविष्य का सपना ही दिखाना होता है परंतु जो सत्ता में होता है उसे तो अपने कार्यकर्ताओं की जमीनी हकीकत से रूबरू होना ही पड़ता है और यह तो तय है कि जिस भी पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता अपने संगठन से असंतुष्ट होंगे उसे चुनावी वैतरणी पार करने में कठिनाई अवश्य ही होगी।

इधर यदि उत्तर प्रदेश की सरकार की कार्यशैली पर नजर डाली जय तो सरकार के क्रियाकलापों से स्पष्ट है कि सरकार चुनावी मोड में आ चुकी है और भाजपा की सरकार के साढ़े चार साल पूरे होने पर सरकार के कामकाज को जनता तक पहुचाने के लिए सरकार के प्रभारी मंत्रियों द्वारा अपने अपने प्रभार वाले जिलों में जाकर सरकार के काम को जनता तक पहुंचाने के लिए पत्रकार वार्ता का आयोजन किया जा रहा है ।परन्तु यहीं से सरकार की समस्या भी बढ़ जा रही है क्यूंकि देखने मे आ रहा है कि उन पत्रकार वार्ताओं में पत्र प्रतिनिधियों के द्वारा लोकल क्षेत्र के लिए किए गए विकास कार्यो पर तीखे सवालों से सरकार के मंन्त्री जबाब देने के बजाय बचते नजर आ रहे हैं ।

इससे यह बात तो स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के काम गिना कर उत्तर प्रदेश सरकार अपनी चुनावी वैतरणी पार करने की जो जुगत लगा रही है उससे तो काम चलने वाला नहीं है और दूसरी तरफ लोकल कार्यकर्ताओं की साढ़े चार साल की उपेक्षा से भी सत्ताधारी दल को दो चार होना पड़ेगा ।यहां यह बात भी विचारणीय है और इतिहास गवाह है कि टूटे मन से लड़ने वाले अपने योद्धाओं से कोई भी जंग नहीं जीत सका है चाहे सेनापति कितना भी कुशल क्यूँ न हो। यह तो स्पष्ट है कि लड़ाकों के मन में उत्साह होना युद्ध क्षेत्र में आवश्यक होता है और सत्ताधारी दल को चुनावी मैदान में कूदने से पहले अपने टूट चुके निराशा में डूबे पिछले साढ़े चार साल सेउपेक्षा का दंश झेल रहे निचले पायदान पर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं में जोश भरने जैसे कार्य करने होंगे जो दुरूह लगता है इससे एक बात तो स्पष्ट है कि आने वाले साढ़े चार महीने , साढ़े चार साल से मलाई काट रहे सत्ताधारी दल के संगठन में ऊंची रसूख रखने वाले लोगों पर भारी पड़ने वाले हैं।

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