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प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का क्षत्रियत्व

राजेंद्र द्विवेदी

डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह ‘संजय’

भारतीय समाज और इतिहास के अध्ययन में एक बड़ी समस्या यह रही है कि आधुनिक काल में प्रचलित जाति-संज्ञाओं को प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय समाज पर यथावत् आरोपित कर दिया जाता है। फलतः वर्ण, वंश, जाति, वृत्ति, व्यवसाय, कुल, गोत्र और सामाजिक संज्ञा— इन सबको एक-दूसरे का पर्याय समझ लेने की भूल होती है। भारतीय धर्मशास्त्रीय और ऐतिहासिक परम्परा का अनुशीलन इसके विपरीत यह बताता है कि सामाजिक पहचान एक दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया में निर्मित होती रही है और अनेक समुदायों के नाम उनके व्यवसाय, निवास-स्थान, राजनीतिक स्थिति तथा कालान्तर में स्वीकृत सामाजिक वृत्ति के कारण परिवर्तित हुए हैं। इसी ऐतिहासिक पद्धति के आलोक में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के कुल, उनकी वर्तमान सामाजिक पहचान और उनके परिवार में संरक्षित परमार-राजपूत वंशस्मृति का परीक्षण किया जाना चाहिए।

इस विमर्श को नया आधार प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के अनुज प्रह्लाद मोदी के 20 नवम्बर, 2025 ई. के उस कथन से प्राप्त होता है, जिसमें उन्होंने अपने परिवार को मूलतः मेवाड़ से आया हुआ बताते हुए उसकी प्राचीन कुलपरम्परा परमार राजपूतों से जोड़ी है— ‘मैं गुजराती हूँ, दसवीं पीढ़ी हमारी गुजरात में है। दस पीढ़ियों से हम गुजरात में हैं, बाक़ी हम मेवाड़ी हैं। राजस्थान से हमारे बुज़ुर्ग गुजरात गये थे, जैसे आज आप सब गुजरात में रोज़ी-रोटी के लिए जाते हैं, वैसे ही गये थे और वहाँ जाकर तेल का धन्धा पकड़ लिया था, जैसे मिट्टी के तेल का आप लोगों ने पकड़ लिया था, वैसे ही हमारे बुज़ुर्गों ने भी तिल के तेल का धन्धा पकड़ लिया और हम मोदी बन गये। हमारा इतिहास कहता है कि हम राजपूत हैं और परमार हैं, लेकिन जब धन्धा बदल गया, तो राजपूतों ने हमारा बहिष्कार किया। हमारा माइग्रेट कायम ही हो गया।...’।1 उनके कथन का सार यह है कि उनका परिवार लगभग दस पीढ़ियों से गुजरात में निवास कर रहा है; उसके पूर्वज मेवाड़ से गुजरात गये, वहाँ तिल के तेल का व्यवसाय ग्रहण किया और व्यवसाय-परिवर्तन के साथ ‘मोदी’ पहचान प्रतिष्ठित हुई। परिवार की पुरानी कुलस्मृति स्वयं को परमार राजपूत मानती है। यह कथन इसलिए विशेष महत्त्व रखता है कि इसमें केवल किसी गौरवसूचक राजपूत पहचान का दावा नहीं है, बल्कि तीन विशिष्ट सूचनाएँ एक साथ आती हैं— मूलस्थान मेवाड़, वंश परमार और बाद में तेल-व्यवसाय का ग्रहण।

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के परिवार की वर्तमान सामाजिक पहचान मोढ-घाँची समुदाय से सम्बद्ध है। गुजरात सरकार ने मोढ-घाँची को 25 जुलाई, 1994 ई. को राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में सम्मिलित किया था। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने 15 नवम्बर, 1997 ई. को इसे केन्द्रीय सूची में सम्मिलित करने की संस्तुति की और 27 अक्टूबर, 1999 ई. को उसकी राजपत्र-अधिसूचना हुई। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने इन तिथियों की आधिकारिक पुष्टि की है।2 आधुनिक प्रशासनिक वर्गीकरण वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण है; वह अपने-आप किसी समुदाय के प्राचीन कुल, गोत्र और वंशपरम्परा का इतिहास नहीं बन जाता। अतः यह देखना आवश्यक है कि ‘घाँची’ संज्ञा का अपना ऐतिहासिक और सामाजिक वृत्तान्त क्या है?

इस प्रश्न पर रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह कृत ‘रिपोर्ट-मरदुमशुमारी राजमारवाड़ सन् 1891’ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करती है। सन् 1891 की जनगणना में घाँचियों की संख्या 6903— पुरुष 3476 और स्त्री 3427— अभिलिखित करने के बाद रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह लिखते हैं— ‘यह क़ौम गुजरात से मारवाड़ में आयी है।’3 इसके बाद सिद्धराज जयसिंह के समय सिद्धपुर-पाटण के रुद्रमाल-मन्दिर के निर्माण से सम्बन्धित एक सामुदायिक उत्पत्ति-परम्परा दी गयी है। निर्माण-कार्य अहर्निश चलने के कारण तेल की बड़ी आवश्यकता थी। तेलियों के घाणियाँ छोड़कर चले जाने के बाद उनकी देखरेख करनेवाले कुछ राजपूतों से घाणियाँ चलवायी गयीं। कार्य समाप्त होने पर वे जब अपनी बिरादरी में गये तो तेल से मैले वस्त्र देखकर उन्हें अपने बीच बैठने नहीं दिया गया। फलतः ‘इस अविज्ञा से इन लोगों ने अपनी अलग न्यात मुक़र्रर कर ली। घानी चलाने और तेल निकालने का काम बदस्तूर जारी रखा और ये कई क़ौमों के राजपूत थे।’4

उसी विवरण में घाँची समुदाय के भाट रामा की परम्परा के आधार पर लिखा है— ‘ये जेठ सुदी 3 संवत् 1191 को घाँची हुए थे।’ इसके साथ यह दोहा उद्धृत है—

संवत् ग्यारा इकानवे जेठ तीज रविवार।

खत्रवट मेल घाँची हुआ जैसिंघ देरी बार।।5

आगे सारनेश्वरजी के मन्दिर, सिरोही के पास एकत्र होकर न्यात की मर्यादा निश्चित करने का उल्लेख है और उसके पश्चात् वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूचना आती है जो प्रस्तुत विमर्श से सीधे जुड़ती है— ‘मारवाड़ के घाँची अपना आना आबू से बताते हैं। इनके गोत परमार, सोलंकी, भाटी, बोड़ाना, गहलोत, देवड़ा, पड़िहार, राठौड़ और सिसोदिया वग़ैरे हैं।’6 इस सूची में परमार का नाम सर्वप्रथम है। ये नाम राजपूताना के सुप्रसिद्ध राजपूत वंशों और शाखाओं से सम्बद्ध हैं। इसी विवरण के अन्त में यह भी लिखा है— ‘घाँची तेलियों के साथ खापी, तो लेते हैं मगर सगपन नहीं करते।’7 इससे सन् 1891 ई. में अभिलिखित समुदाय-स्मृति में घाँची और तेली की सामाजिक पहचान पूर्णतः अभिन्न नहीं दिखायी देती।

इस स्रोत की महत्ता असाधारण है। प्रह्लाद मोदी के 2025 ई. के पारिवारिक कथन में राजपूत → परमार → तेल का व्यवसाय → मूल बिरादरी से बहिष्कार → परिवर्तित सामाजिक पहचान की जो संरचना आती है, उसका एक निकट समानान्तर 1891 ई. में अभिलिखित घाँची-परम्परा में राजपूत → घाणी → तेल निकालना → बिरादरी से पृथक्करण → पृथक् न्यात → परमार आदि गोत के रूप में मिलता है। इससे मोदी-परिवार की विशिष्ट वंशावली स्वतः प्रमाणित नहीं होती, किन्तु 2025 ई. में व्यक्त पारिवारिक स्मृति को ऐतिहासिक परीक्षण के योग्य ठोस सामाजिक पृष्ठभूमि अवश्य प्राप्त होती है।

इस सामाजिक प्रक्रिया को विद्यावारिधि पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र कृत ‘जातिभास्कर’ की सूचना और अधिक अर्थपूर्ण बना देती है। वे लिखते हैं— ‘इस समय एक तेली जाति जो, राजपूताना, बिहार आदि प्रान्तों में पायी जाती है, उसमें लोग धनाढ्य तथा अच्छे अच्छे व्यापारी भी हैं। एक पत्र भी उस जाति का ‘तेली समाचार’ के नाम से निकलता है। इनके हाथ का जल लोग ग्रहण नहीं करते हैं, पर सुनते हैं, राजपूताने में इनके हाथ की मिठाई खाते हैं। बंगाल में तेली जाति कालू कहाती हैं। शास्त्रों में उशना और जातिविवेक ग्रन्थों में तो इस जाति के लिए सांकर्य ही है, परन्तु दूसरे लोग इस विषय में क्या प्रमाण रखते हैं, सो अभी विदित नहीं, पर स्मृतिशास्त्र तो यह दो ही भेद मानता है, सम्भव है कि एक दूसरी कोई सदाचारी जाति भी तेली नाम से ग्रहण की जाती हो। जैसा कि राठोर, चौहान, जसवार, राठी आदि शब्दों के पीछे भी तेली शब्द का प्रयोग देखा जाता है, सम्भव है कि बिहारादि प्रान्त के तेली कोई अन्य जाति के हों तेल का व्यापार करने से तेली कहाने लगे हों, परन्तु शुद्ध तैलकार जाति की उत्पत्ति इसी प्रकार है।’8

पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र का यह कथन स्पष्टतः यह सम्भावना स्वीकार करता है कि विभिन्न मूलों के लोग तेल-व्यवसाय ग्रहण करने के कारण कालान्तर में तेली कहलाये हों। ‘राठोर तेली’, ‘चौहान तेली’ आदि उदाहरण और 1891 ई. की घाँची-गोत्रसूची में ‘परमार, सोलंकी, भाटी, गहलोत, देवड़ा, पड़िहार, राठौड़ और सिसोदिया’ जैसे नामों की उपस्थिति को साथ रखकर देखने पर व्यवसाय और सामाजिक संज्ञा के मध्य सम्बन्ध का प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

यही पृष्ठभूमि प्रह्लाद मोदी के 20 नवम्बर, 2016 ई. के भोपाल-वक्तव्य को समझने में भी सहायक है। अखिल भारतीय साहू समाज के सम्मेलन में सम्मिलित हुए प्रह्लाद मोदी के वक्तव्य को समाचार का रूप देते हुए ‘पी.टी.आई.’ ने लिखा है–

‘Prahlad Modi, the younger brother of Prime Minister Narendra Modi, on Sunday asked his community members to prefix ‘Modi’ to their names. 'After coming here I am only hearing one thing, Narendra Modi is pride of India and of his community. But why we, the members of Teli Samaj (oil-makers' community) are not ready to prefix Modi to our names,' Prahlad said in Bhopal at an all-India meet of young men and women of the ‘Sahu’ community. Leaders of his community, for their selfish motives, use names of sub-castes such as Sahu, Chauhan, Parmar, Rathod and Jaiswal, he said. Goddess Karma Devi was a Teli and 'we are her children and we are Teli and Modis,' he added.’9

अर्थात् प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के छोटे भाई प्रह्लाद मोदी ने रविवार को अपने समुदाय के सदस्यों से अपने नाम के आगे ‘मोदी’ लगाने को कहा। भोपाल में ‘साहू’ समुदाय के युवक-युवतियों की एक अखिल भारतीय बैठक में प्रह्लाद ने कहा, ‘यहाँ आने के बाद मैं केवल एक ही बात सुन रहा हूँ कि नरेन्द्र मोदी भारत और अपने समुदाय के गौरव हैं। लेकिन हम, तेली समाज (तेल बनानेवाले समुदाय) के सदस्य, अपने नाम के आगे मोदी लगाने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?’ उन्होंने कहा कि उनके समुदाय के नेता अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए साहू, चौहान, परमार, राठौड़ और जैसवाल जैसी उप-जातियों के नामों का उपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि देवी कर्मा तेली थीं और ‘हम उनके बच्चे हैं और हम तेली और मोदी हैं।’

सन् 2016 ई. के इस वक्तव्य को तत्कालीन व्यापक जातीय-सामुदायिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक एकीकरण के परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जा सकता है। उसमें साहू, चौहान, परमार, राठौड़ और जैसवाल जैसे विभिन्न नामों के ऊपर ‘तेली/मोदी’ की व्यापक सामुदायिक पहचान पर बल है। 2025 के वक्तव्य का प्रश्न भिन्न है— वहाँ अपने विशिष्ट परिवार के मूल की चर्चा करते हुए प्रह्लाद मोदी मेवाड़, राजपूत और परमार— तीनों संज्ञाएँ देते हैं। केवल ‘राजपूत’ जैसा व्यापक पद न कहकर ‘परमार’ जैसा विशिष्ट वंशनाम बताना इस कथन को ऐतिहासिक रूप से परीक्षणयोग्य बनाता है, यद्यपि कथन की विशिष्टता अपने-आप उसका प्रमाण नहीं है।

भारतीय धर्मशास्त्रीय व्यवस्था में वृत्ति-परिवर्तन का प्रश्न भी इस प्रसंग में विचारणीय है। जातिभास्कर में पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र लिखते हैं—

प्रतिग्रहोऽध्यापनञ्च याजनं दूत्यमेव च।

विप्राणां जीविका तत्र दूत्यं पाक्षिकमिष्यते।।

प्रतिग्रहादौ नान्येषामधिकारत्रिके क्वचित्।

विप्रक्षत्त्रियमध्यस्थाः कथंचिदधिकारिणः।।

युद्धं हि क्षत्त्रिये मुख्यं रथमातगवाजिनाम्।

रक्षणानि क्रिया नाना सारथ्याद्यापदि स्मृतम्।।

कृषिगोरक्षवाणिज्यं नानाकर्मसु कौशलम्।

विट्शूद्रजीविका प्रोक्ता शूद्रे तु द्विजसेवनम्।।10

इसका भावार्थ है कि ब्राह्मण की प्रधान आजीविका प्रतिग्रह, अध्यापन और याजन मानी गयी; क्षत्रिय की मुख्य वृत्ति युद्ध तथा प्रजारक्षण है; कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य वैश्य की आजीविका हैं और द्विजों की सेवा शूद्र की वृत्ति कही गयी। साथ ही आपत्ति और जीवन-निर्वाह की परिस्थितियों में वृत्तियों के परिवर्तन की सम्भावना धर्मशास्त्रीय व्यवस्था में विद्यमान थी। इसी तथ्य को अगले श्लोक और स्पष्ट करते हैं—

स्ववृत्त्यासेवनं क्षत्त्रे क्षत्त्रस्य न निषिध्यते।

नीचसेवा तु सर्वेषां निन्दिता परिकीर्तिता।।

आपद्यपि च कष्टायां सन्निकृष्टस्य वृत्तिभिः।

सर्वेऽपि जीवनं कुर्युर्नापकृष्टस्य सेवनम्।।11

अर्थात् अपनी निर्धारित वृत्ति से जीवन-निर्वाह सम्भव न रहने पर आपत्ति की अवस्था में निकटवर्ती वृत्ति ग्रहण करके जीविका चलाने की व्यवस्था स्वीकार की गयी। अतः वृत्ति-परिवर्तन को अपने-आप रक्तवंश के परिवर्तन का पर्याय मानना शास्त्रीय दृष्टि से भी आवश्यक नहीं है।

जाति (ज्ञाति) से बहिष्कार के प्रश्न पर जातिभास्कर के वर्णसंकरजातिविवेकाध्याय में उद्धृत श्लोक और अधिक प्रासंगिक हैं—

ज्ञातित्यक्तो हि कुरुते पापं ज्ञातिविवर्जितः।

तत्पापं ज्ञातिबन्धूनां जायते मनुरब्रवीत्।।

ज्ञात्वापि विहितं कर्म ज्ञातिभिः परिवर्जितम्।

प्रायश्चित्ते पुनर्जातिमानयेन्मनुरब्रवीत्।।

ज्ञातित्यक्तं तु पुरुषं ज्ञातिमध्ये समानयेत्।

प्रायश्चित्तेन विधिना नोचेद्भ्रान्तिं व्रजत्यपि।।12

इनका आशय है कि जाति (ज्ञाति) द्वारा परित्यक्त व्यक्ति का परित्याग अपरिवर्तनीय नहीं माना गया; विहित प्रायश्चित्त के बाद उसे पुनः जाति (ज्ञाति) में सम्मिलित करने की व्यवस्था कही गयी है। इस प्रकार व्यवसाय-परिवर्तन, सामाजिक बहिष्कार और पृथक् जाति अथवा न्यात का निर्माण भारतीय सामाजिक इतिहास की समझ से बाहर की घटनाएँ नहीं हैं।

अब प्रश्न उस ‘परमार’ पहचान का है, जिसका उल्लेख प्रह्लाद मोदी करते हैं। परमारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अनुशीलन करते हुए मौर्य, मोरिय और मोरी नामों की एक दीर्घ परम्परा सामने आती है। इसका सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण आधार बौद्ध साहित्य है। दीघनिकाय के महापरिनिब्बान-सुत्त में भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद पिप्पलिवन के मोरियों ने धातु-अवशेषों में अपना भाग माँगते हुए अपने क्षत्रियत्व को आधार बनाया— ‘भगवा पि खत्तियो, मयम्पि खत्तिया...’ अर्थात् भगवान् भी क्षत्रिय थे और हम भी क्षत्रिय हैं; इसलिए हम भी भगवान् के शरीरावशेष के भाग के अधिकारी हैं।13

यह प्रमाण इसलिए विशेष महत्त्वपूर्ण है कि यहाँ ‘मोरिय’ समुदाय स्वयं को ‘खत्तिय’ अर्थात् क्षत्रिय कह रहा है। सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. हेमचन्द्र रायचौधुरी ने ‘Political History of Ancient India’ में ‘महावंश’, ‘दिव्यावदान’ और ‘महापरिनिब्बानसूत्त’ के प्रमाणों को एक साथ रखते हुए उल्लेख किया कि ‘महावंश’ चन्द्रगुप्त को मोरिय वंशोद्भूत कहा है। ‘दिव्यावदान’ में एक स्थल

पर बिन्दुसार (1500–1472 सा.यु.पू.) ने एक स्त्री से कहा है– ‘त्वं नापिनी अहं राजा क्षत्रियो मूर्धाभिषिक्तो। कथं मया सार्धं समागमो भविष्यति?’ अन्यत्र इसी ग्रन्थ में सम्राट् अशोक (1472–1436 सा.यु.पू.) ने अपनी रानी से कहा है– ‘देवि! अहं क्षत्रियः। कथं पलाण्डुं परिभक्ष्यामि।’ ‘महापरिनिब्बानसुत्त’ पिप्पलिवन के मोरियों को क्षत्रिय शासक-कुल के रूप में प्रस्तुत करता है।14

ऐतिह्यविद् डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने ‘Chandragupta Maurya and His Times’ में सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य की निम्नोत्पत्ति की उत्तरकालीन व्याख्या का भाषाशास्त्रीय परीक्षण करते हुए ‘मुरा’ से ‘मौर्य’ की व्युत्पत्ति को असंगत माना और बौद्ध-जैन परम्पराओं को उनके कुल के विषय में अधिक महत्त्व दिया। ‘महावंश’ में चन्द्रगुप्त को क्षत्रिय मोरिय कुल में उत्पन्न कहा गया है और दीघनिकाय (2/167) में पिप्पलिवन के मोरिय क्षत्रिय समुदाय का उल्लेख है। राधाकुमुद मुखर्जी, लाहा, हेमचन्द्र रायचौधरी, चटर्जी आदि अनेक इतिहासकारों ने इससे सम्बन्धित विवेचन करते हुए आधुनिक स्रोतों से इस मूल सन्दर्भ की पुष्टि की है।15 षोडश शती सा.यु.पू. तक यह जाति मगध साम्राज्य में विलीन होकर अपना महत्त्व खो चुकी थी, इसलिए उसमें उत्पन्न युवक चन्द्रगुप्त मौर्य अगर क्लासिकल (शास्त्रीय) लेखकों को ‘मामूली घराने' में उत्पन्न लगा तो कोई आश्चर्य नहीं।16

मोरिय क्षत्रिय का यह नाम सम्भवतः ‘टॉटमिस्टिक’ था और ‘मयूर' अथवा ‘मोर’ शब्द से सम्बन्धित था। आचार्य बुद्धघोष ने ‘महापरिनिब्बानसुत्त’ की टीका में लिखा है कि राज्य में मयूरों की बहुतायत उपलब्धता के कारण मोरिय नाम पड़ा। प्राचीनकाल में बृहत-सी जातियों के नाम वृक्षों की (यथा– पल्लव, कदम्ब, ओदुम्बर आदि) अथवा पशु-पक्षियों (यथा– अज, कुलिंग, आश्वायन आदि) के नामों पर रखे गये मिलते हैं। हो सकता है मोरिय भी इसी प्रकार का नाम हो। लौरिया-नन्दगढ़ के अशोक स्तम्भ के निचले सिरे पर ‘मोर’ की लगभग 4 इंच लम्बी मूर्ति उत्कीर्ण है। साँची स्तूप में पूर्वी तोरण के बाह्यभाग में, जहाँ अशोक-द्वारा बोधिवृक्ष की यात्रा का दृश्य उत्कीर्ण है, वहीं मोर के भी चित्र उकेरे गये है। ग्रुनवैलेड का मत है कि ये चित्र इस बात के द्योतक हैं कि मोर मौर्यों का वंश-चिह्न है। जॉन मार्शल, फूशे, राधाकुमुद मुखर्जी आदि इतिहासकार ग्रुनवैलेड के इस मत से सहमत हैं।17

डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य की सामाजिक प्रतिष्ठा के विषय में कुछ परोक्ष संकेत आचार्य कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र' से भी मिलते हैं। इस ग्रन्थ के अन्त में कहा गया है कि अर्थशास्त्र विषयक इस ग्रन्थ की रचना उस विष्णुगुप्त ने की, जिसने शास्त्र, शस्त्र और नन्दराज के अधीनस्थ भूमि का क्रोधपूर्वक शीघ्र उद्धार किया। आचार्य कौटिल्य परम्परागत वर्ण-व्यवस्था के कट्टर समर्थक थे और क्षत्रियों को ही राजसत्ता का अधिकारी मानते थे। वे कहते थे, जो राजा उच्चकुलोत्पन्न (अभिजात) होता है, वह चाहे दुर्बल भी क्यों न हो, प्रजाजन (प्रकृति) अपने आप उसके सामने झुक जाते हैं, क्योंकि उनमें कुलोत्पत्ति अर्थात् कुलीनता एवं ऐश्वर्य की योग्यता के प्रति स्वाभाविक सम्मान की भावना होती है। इसके प्रतिकूल वे नीचकुलोत्पन्न (अनभिजात) राजा का चाहे वह बलवान ही क्यों न हो. विराग के कारण विरोध करते हैं; क्योंकि अनुराग ही समस्त गुणों का आश्रय है। डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार इसे पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है मानो आचार्य कौटिल्य अपनी सफ़ाई दे रहे हों कि उन्होंने शक्तिशाली और धनवान, परन्तु शूद्र नन्द राजा की तुलना में चन्द्रगुप्त जैसे साधारण व्यक्ति को जो एक कुलीन क्षत्रिय था, राजपद के लिए अधिक उपयुक्त क्यों समझा।18

मौर्यों की सामाजिक प्रतिष्ठा के विषय में पौराणिक साक्ष्य भी पर्याप्त उपयोगी हैं। पुराणों के अनुसार शिशुनागवंशीय नरेशों के पश्चात् शूद्रवंशीय एवं अधार्मिक नवनन्दों का शासन होगा। इसके उपरान्त नवनन्दों का विनाश कौटिल्य (चाणक्य) नामक ब्राह्मण करेगा, जो चन्द्रगुप्त को राजपद पर अभिषिक्त करेगा। यथा–

उद्धरिष्यति तान् सर्वान् कौटिल्यो वै द्विजर्षभः।

कौटिल्य चन्द्रगुप्तं तु ततौ राज्येभिषेक्ष्यति।।19

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि पुराणकारों को केवल नन्दों के नीचकुलोत्पन्न होने का ज्ञान था, वे मौर्यवंशीय नरेशों को इस कोटि में नहीं रखते। उल्टे शूद्रवंशीय नन्दों के विनाश और चन्द्रगुप्त मौर्य के अभिषेक की चर्चा करके वे यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि स्वयं चन्द्रगुप्त मौर्य अभिजात क्षत्रिय है।

वस्तुतः बौद्ध-साहित्य के अन्तःसाक्ष्यों से प्रमाणित है कि भगवान् बुद्ध का जन्म इक्ष्वाकु वंश की जिस पुनीत शाक्य शाखा में हुआ था, उसी शाखा से मोरिय भी सम्पृक्त हैं। बौद्धग्रन्थ ‘महावंस’ की नौवीं शती में रचित ‘वंसत्थप्पकासिनी’ नाम्ना टीका में वर्णित है कि कोसल-नरेश प्रसेनजित् के उत्तराधिकारी विडूडभ ने जब शाक्यों का विनाश किया तो उनकी एक शाखा पर्वतीय प्रदेश की तरफ़ भाग गयी और वहाँ एक ऐसे रमणीय भूखण्ड में बस गयी, जहाँ पिप्पली वृक्षों का वन था। वहाँ उसने प्राचीरों से सुरक्षित एक सुन्दर नगर का निर्माण किया, जिसमें मोरों की ग्रीवा (गर्दन) के रंग की ईंटों का प्रयोग किया था और जो मोरों के स्वर से गुंजित रहता था। इसीलिए इस नगर के निवासी शाक्य मोरिय कहलाये। यथा– ‘तं मयूरगीवसकासछटानिट्ठकपासादपंतिकं च मयूरकेकानादेहि पूरितमुग्धोसितं च अहोसि। तेन तस्य नगरस्य सामिनो साकिया च तेसं पुत्तापपुत्ता च सकलजम्बूदीपे मोरिया नामा ति पाकटा जाता।’20

वंसत्थप्पकासिनी टीका में ही मोरिय शब्द की एक अन्य व्युत्पत्ति भी दी गयी है, जिसके अनुसार उपर्युक्त नगर के निवासी उस नगर के सौन्दर्य से मुदित होने के कारण ‘मोदिय’ कहलाये, परन्तु इस नाम में ‘द’ का स्थान ‘र’ द्वारा ले लिये जाने के कारण यह नाम ‘मोरिय’ हो गया– ‘मोरियं ति अत्रानं नगरसिरिया मोदापीति एत्थ संजाता ति दुकारस्य च रकारे कल्या मोरिया ति लद्धवोहारानं खत्तियानं ति अत्थो।’21

दसवीं शती ई. में रचित मोग्गल्लान के ‘महावंस’ में भी मोरियों की शाक्यों से उत्पत्ति की उपर्युक्त कथा दी गयी है। इसी तरह दसवीं-ग्यारहवीं शती में रचित ‘महाबोधिवंस’ का वर्णन भी मूलतः ‘वंसत्थप्पकासिनी टीका’ के जैसा ही है। इस अनुश्रुति का समर्थन सी.डी. चटर्जी, बी.सं. लाहा, राधाकुमुद मुकर्जी आदि अनेक विद्वान् इतिहासकार भी करते हैं।22

डॉ. आर. सी. मजूमदार, पुरुषोत्तमलाल भार्गव तथा अन्य अनेक इतिहासकारों ने भी बौद्ध-परम्परा के आधार पर सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य और मोरिय समुदाय के क्षत्रियत्व की चर्चा की है। इतिहास-लेखन में इसके विपरीत परम्पराएँ भी रही हैं; अतः यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्राचीन बौद्ध-स्रोत स्वयं ‘मोरिय’ को क्षत्रिय कहते हैं, जबकि चन्द्रगुप्त की विशिष्ट उत्पत्ति के विषय में बाद के बौद्ध, जैन, ब्राह्मण और यूनानी वृत्तान्त सर्वथा एकमत नहीं हैं। डॉ. हेमचन्द्र रायचौधुरी भी सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य की वंश-परम्परा (ancestry) को निश्चित न मानते हुए उपलब्ध परम्पराओं का तुलनात्मक परीक्षण करते हैं।

मोरिय और शाक्य सम्बन्ध की बौद्ध-परम्परा इस वंश-विमर्श को एक और प्राचीन धरातल प्रदान करती है। डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने मोरियों को शाक्यों से सम्बद्ध क्षत्रिय शाखा के रूप में ग्रहण किया है। शाक्य स्वयं बौद्ध वंश-परम्परा में इक्ष्वाकु-सम्बद्ध क्षत्रिय माने गये हैं। अतः इक्ष्वाकु → शाक्य → मोरिय का सूत्र आधुनिक जातीय कल्पना के रूप में नहीं, अपितु प्राचीन पुराणेतिहासिक और आधुनिक बौद्धेतिहासिक व्याख्याओं में उपस्थित वंशस्मृति के रूप में सामने आता है। इस सूत्र को प्रत्यक्ष जैविक वंशावली और साहित्यिक वंश-परम्परा के बीच आवश्यक भेद रखते हुए पढ़ना चाहिए।

मौर्यों की सूर्यवंशीय वंशस्मृति का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अभिलेखीय प्रमाण खानदेश के वाघली से प्राप्त मौर्यवंशी शासकों का अभिलेख है, जो Epigraphia Indica, Vol. II में ‘Stone Inscriptions at Vāghlī in Khandesh’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। शक 991 अर्थात् 1069 ई. के इस अभिलेख की द्वितीय पंक्ति में मनु, सूर्यवंश, मान्धाता और मौर्यवंश को परस्पर सम्बद्ध करते हुए वंशप्रशस्ति दी गयी है—

‘…[तद]नु मनुरभूत्तद्-द्युतात्सूर्यवंशः।

विख्यातः सर्वलोकेष्वमलनृपगुणैरन्वितः कीर्तिधर्मैः।

मान्धातुर्भूमिपालात्सकलगुणनिधेर्मौर्य[वंशो]…’23

अर्थात् प्रशस्तिकार राजवंश की पूर्वपरम्परा को मनु से प्रारम्भ कर सूर्यवंश तथा सूर्यवंशीय मान्धाता के माध्यम से मौर्यवंश तक ले जाता है। यह अभिलेख इस दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है कि ग्यारहवीं शताब्दी में पश्चिम भारत का एक मौर्य नामधारी राजकुल अपनी वंशस्मृति को मनु, सूर्यवंश और मान्धाता में प्रतिष्ठित कर रहा था। इसका अभिप्राय प्राचीन चन्द्रगुप्त-मौर्य साम्राज्य का ग्यारहवीं शताब्दी तक राजनीतिक रूप से अक्षुण्ण रहना नहीं, बल्कि मौर्य नाम और उसकी सूर्यवंशीय राजवंश-स्मृति की दीर्घजीविता है।

मौर्य से मोरी और मोरी से परमार सम्बन्ध का प्रश्न इस अनुसन्धान की अगली कड़ी है। पश्चिमी भारत और विशेषतः चित्तौड़ की इतिहासपरम्परा में मौर्य और मोरी दोनों नाम मिलते हैं। ए. सी. एल. कार्लाइल ने ‘Archaeological Survey of India की अपनी रिपोर्ट A Tour in Eastern Rajputana in 1871–72 and 1872–73’ में मोरी/मौर्य परम्परा का उल्लेख किया। चित्तौड़ सम्बन्धी राजकीय और पुरातात्त्विक विवरणों में भी गहलोतों से पूर्व मोरी अथवा मौर्य शासकों की स्मृति सुरक्षित है।24

कर्नल जेम्स टॉड का विवरण इस सम्बन्ध में और अधिक स्पष्ट है। ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ में वे परमारों की पैंतीस शाखाओं की सूची देते हुए लिखते हैं— ‘Mori [or Maurya].—Of which was Chandragupta, and the princes of Chitor prior to the Guhilot.’25 अर्थात् उनकी वर्गीकरण-पद्धति में मोरी और मौर्य एक ही शाखानाम के दो रूप हैं; सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य तथा गुहिलों से पूर्व चित्तौड़ के शासकों को वे इसी शाखा से सम्बद्ध करते हैं। टॉड के संस्करण में यह विवरण ‘Thirty-Five Sakha of the Pramaras’ के अन्तर्गत आता है।

कर्नल जेम्स टॉड एक अन्य स्थान पर सम्राट् चन्द्रगुप्त को मौर्य बताते हुए मौर्यों को परमारों की प्रमुख शाखा के रूप में निरूपित करते हैं। टॉड का इतिहास-लेखन उन्नीसवीं शताब्दी की राजपूत-वंशावलियों और भाट-परम्पराओं पर पर्याप्त रूप से आश्रित है; इसलिए उसकी प्रत्येक वंशावली को समकालीन अभिलेख के समान प्रमाण-मूल्य नहीं दिया जा सकता। फिर भी यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भिक राजस्थान-इतिहासलेखन में मोरी = मौर्य और उसका परमार से सम्बन्ध पहले से विद्यमान था।

डॉ. डी. सी. गांगुली कृत ‘परमार राजवंश का इतिहास’ में भी परमारों की पैंतीस शाखाओं की सूची में ‘मोरी’ प्रथम शाखा है।26 इससे मौर्य-मोरी-परमार सम्बन्ध की वंशपरम्परागत स्मृति कर्नल जेम्स टॉड तक सीमित नहीं रहती। और भी उल्लेखनीय तथ्य यह है कि परमार नाम की व्यापक ऐतिहासिक प्रतिष्ठा की अपेक्षा मौर्य/मोरी नाम की प्राचीनता बहुत पीछे तक जाती है। इसलिए उत्तरकालीन वंशावलियों का ‘मोरी परमार की शाखा है’ कहना ऐतिहासिक सम्बन्ध की दिशा का अन्तिम निर्णय नहीं हो सकता। इसके विपरीत प्राचीन मौर्य/मोरी राजकुलों की कोई धारा कालान्तर में परमार नाम से अधिक प्रसिद्ध हुई— यह शोधपरिकल्पना भी परीक्षण की अपेक्षा रखती है।

‘Anthropological Survey of India’ के ‘People of India: Dadra and Nagar Haveli’ में डॉ. कुमार सुरेश सिंह के सम्पादन में ‘Mauri Rajput’ समुदाय का उल्लेख मिलता है। इस आधुनिक नृवंशविज्ञानात्मक विवरण में मौरी राजपूतों की परमार-सम्बद्ध उत्पत्ति-परम्परा अंकित है।27 यह ग्रन्थ 1992 ई. में Anthropological Survey of India से प्रकाशित हुआ था। इस प्रकार मौर्य–मोरी–परमार सम्बन्ध केवल एक इतिहासकार की निजी धारणा नहीं, विभिन्न राजवंशीय और सामुदायिक स्मृतियों में पृथक् पृथक् रूपों में उपस्थित प्रश्न है।

यहीं उज्जयिनी की राजपरम्परा मौर्य–मोरी–परमार सम्बन्ध के विमर्श को एक और महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक आयाम प्रदान करती है। जैन-कालगणना और उज्जयिनी के राजवृत्त से सम्बद्ध परम्पराओं में सम्राट् अशोक के पौत्र सम्राट् सम्प्रति का उज्जयिनी से घनिष्ठ सम्बन्ध मिलता है। आचार्य हस्तीमलजी महाराज द्वारा विवेचित जैन-परम्परा के अनुसार सम्राट् सम्प्रति के कोई पुत्र नहीं था; अतः उनके पश्चात् सम्राट् अशोक के पुत्र तिष्यगुप्त के पुत्र बलमित्र और भानुमित्र उज्जयिनी की उत्तराधिकार-परम्परा में आते हैं। बलमित्र के पश्चात् उनके पुत्र नभोवाहन तथा नभोवाहन के पुत्र गर्दभिल्ल की राजपरम्परा चलती है। जैन-स्रोतों की एक पृथक् परम्परा इन्हीं गर्दभिल्ल के पुत्र सम्राट् विक्रमादित्य को उज्जयिनी का अधिपति और शक-सत्ता का उच्छेदक बताती है। विचारश्रेणि में मेरुतुङ्ग द्वारा उद्धृत परम्परा का कथन है— ‘तदनु गर्दभिल्लस्यैव सुतेन विक्रमादित्येन राज्ञोज्जयिन्या राज्यं प्राप्य सुवर्णपुरुषसिद्धिबलात् पृथिवीमनृणां कुर्वता विक्रमसंवत्सरः प्रवर्तितः।’ अर्थात् तदनन्तर गर्दभिल्ल के ही पुत्र विक्रमादित्य ने उज्जयिनी का राज्य प्राप्त कर, सुवर्णपुरुष-सिद्धि के बल से पृथ्वी को ऋणमुक्त करते हुए विक्रम-संवत्सर का प्रवर्तन किया। इसी परम्परा के दूसरे पाठ में मौर्य-नरेशों राजाओं का क्रम देते हुए सम्प्रति के पश्चात् स्पष्टतः कहा गया है— ‘तद्वंशे एव गर्दभिल्लो राजा; तदुच्छेदे शको राजा। तावता गर्दभिल्लस्यैव पुत्रो विक्रमादित्यः शकमुच्छेद्य तत्रैवोपविष्टः।’ अर्थात् उसी वंश में गर्दभिल्ल राजा हुए; उनके राज्योच्छेद के पश्चात् शक का शासन हुआ और गर्दभिल्ल के ही पुत्र विक्रमादित्य ने शक का उच्छेद कर पुनः वहीं राज्य स्थापित किया। इस पाठ का ‘तद्वंशे एव’ पद विशेष ध्यान देने योग्य है, क्योंकि जैन-परम्परा गर्दभिल्ल को पूर्वोक्त मौर्य राजपरम्परा से पृथक् न करके उसी वंशक्रम में रखती है।28

इस प्रकार उक्त जैन-परम्परा में उपलब्ध राजवंशीय अनुक्रम को सूत्ररूप में सम्राट् अशोक → तिष्यगुप्त → बलमित्र–भानुमित्र → नभोवाहन → गर्दभिल्ल → विक्रमादित्य के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। भर्तृहरि को भी गर्दभिल्ल-पुत्र तथा विक्रमादित्य का ज्येष्ठ भ्राता माननेवाली सुविख्यात परम्परा विद्यमान है, किन्तु ऊपर उद्धृत जैन-पाठ में इस स्थान पर भर्तृहरि का नाम न होने के कारण उन्हें इसी प्रत्यक्ष स्रोत-सिद्ध वंशक्रम में जोड़ने के स्थान पर पृथक् परम्परा के रूप में विवेचित करना अधिक समीचीन है। इसी प्रकार अन्य साहित्यिक-ऐतिहासिक परम्पराओं में गर्दभिल्ल के स्थान पर ‘महेन्द्रादित्य’ का नाम प्राप्त होता है; किन्तु प्रस्तुत जैन-पाठ का प्रत्यक्ष कथन ‘गर्दभिल्ल’ ही है।

मुनि कल्याणविजय ने ‘वीर निर्वाण संवत् और जैन काल-गणना’ में इसी सामग्री का एक भिन्न और अत्यन्त विचारोत्तेजक कालगणनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया है। वे बलमित्र और भानुमित्र के शासन की चर्चा करते हुए लिखते हैं— ‘भरोच में 52 वर्ष और उज्जैन में 8 वर्ष, सब मिलकर 60 वर्ष तक बलमित्रभानुमित्र ने राज्य किया। यही जैनों का बलमित्र पिछले समय में ‘विक्रमादित्य’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।’29 इस मत में बलमित्र और विक्रमादित्य दो पृथक् व्यक्तियों के स्थान पर एक ही ऐतिहासिक व्यक्तित्व के दो नाम माने गये हैं। मुनि कल्याणविजय इस तादात्म्य के समर्थन में ‘बल’ और ‘विक्रम’ तथा ‘मित्र’ और ‘आदित्य’ की अर्थसाम्यता की ओर भी संकेत करते हैं। दूसरी ओर मेरुतुङ्गीय परम्परा ‘गर्दभिल्ल’ के पुत्र के रूप में ‘विक्रमादित्य’ को रखती है। परिणामतः जैन-परम्परा के भीतर ही ‘विक्रमादित्य’ की वंशस्थिति के विषय में दो व्याख्यात्मक धाराएँ सुरक्षित दिखायी देती हैं— एक में वे ‘गर्दभिल्ल’ के पुत्र हैं, दूसरी में ‘बलमित्र’ के साथ उनका तादात्म्य स्थापित किया गया है।

इन दोनों परम्पराओं का वास्तविक ऐतिहासिक महत्त्व उनके पारस्परिक भेद को मिटाने में नहीं, बल्कि उनके साझा आधार को पहचानने में है। दोनों ही विक्रमादित्य की उज्जयिनी को किसी सर्वथा असम्बद्ध नवीन राजसत्ता के रूप में प्रस्तुत नहीं करतीं; वे उसे मौर्य-सम्बद्ध उज्जयिनी की पूर्ववर्ती राजपरम्परा और कालस्मृति के भीतर रखती हैं। इस प्रकार विक्रमादित्य को परमार माननेवाली उत्तरकालीन राजवंशीय परम्परा तथा उन्हें मौर्योत्तर उज्जयिनी की सत्ता-परम्परा में प्रतिष्ठित करनेवाली जैन-स्मृति के मध्य एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सेतु निर्मित होता है। मौर्य–मोरी–परमार सम्बन्ध के परीक्षण में यह सेतु इसलिए विशेष विचारणीय है कि यहाँ केवल नामसाम्य नहीं, बल्कि उज्जयिनी, राजवंश, उत्तराधिकार और विक्रमादित्य— इन चारों तत्त्वों की संयुक्त परम्परा उपस्थित है।

परमारों की अग्निवंशीय उत्पत्ति का प्रसिद्ध आख्यान भी यहाँ पुनर्विचार की माँग करता है। अग्निकुण्ड से किसी मनुष्य अथवा राजवंश की भौतिक उत्पत्ति इतिहास का शाब्दिक तथ्य नहीं हो सकती। ‘अग्निकुल’ आख्यान को राजवंशीय संस्कार, राजनीतिक प्रतिष्ठा, धर्मरक्षा और क्षत्रियत्व की प्रतीकात्मक वैधता की मध्यकालीन वंशस्मृति के रूप में पढ़ना अधिक उपयुक्त है। वास्तविक ऐतिहासिक उत्पत्ति के निर्धारण में अभिलेख, प्राचीन वंशावली, राजकीय प्रशस्ति, समकालीन साहित्य और विभिन्न स्रोतों में नामों की कालानुक्रमिक उपस्थिति अधिक महत्त्वपूर्ण है।

इस प्रकार सूर्यवंश से मोदी तक प्रस्तावित दीर्घ ऐतिहासिक यात्रा को सूत्ररूप में— सूर्यवंश → इक्ष्वाकु → शाक्य → मोरिय → मौर्य → मोरी → परमार → घाँची → मोदी— के रूप में रखा जा सकता है। सूर्यवंश–इक्ष्वाकु–शाक्य की कड़ी प्राचीन धार्मिक-वंशपरम्परा की श्रेणी में आती है; मोरियों के क्षत्रियत्व का आधार बौद्ध-साहित्य है; उत्तरकालीन मौर्यों की सूर्यवंशीय आत्मपरम्परा का अभिलेखीय आधार वाघली प्रशस्ति है; मौर्य–मोरी और मोरी–परमार सम्बन्ध इतिहास-लेखन, राजवंशीय शाखा-सूचियों और सामुदायिक परम्पराओं में मिलता है; परमार–घाँची सम्बन्ध के लिए 1891 ई. का मारवाड़ जनगणना-वृत्तान्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है; और घाँची–मोदी सम्बन्ध आधुनिक सामाजिक पहचान तथा स्वयं मोदी-परिवार की कुलस्मृति में स्पष्ट है। इस प्रमाण-श्रेणी को स्पष्ट रखने पर ही सम्पूर्ण प्रस्तावना ऐतिहासिक परीक्षण की कसौटी पर टिक सकती है।

वंशगत प्रश्न से पृथक् भारतीय परम्परा में क्षत्रियत्व का एक गुण-कर्मपरक स्वरूप भी है। महाकवि कालिदास रघुवंश में कहते हैं—

क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्रः

क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः।।30

अर्थात् ‘क्षत’— आघात, नाश और विपत्ति—से जो त्राण करता है, उसी रक्षणकर्तृत्व के कारण ‘क्षत्र’ शब्द संसार में प्रसिद्ध हुआ है। यहाँ क्षत्रियत्व की सार्थकता केवल वंशाभिमान में नहीं, रक्षण में प्रतिष्ठित है।

महामहोपाध्याय पण्डित अरुणकुमार उपाध्याय ने नरेन्द्र मोदी के सम्बन्ध में इसी श्लोक को आधार बनाकर लिखा— ‘क्षतात्किलत्रायत इत्युदग्रः शब्दस्य अर्थः भुवनेषु रूढः’ (रघुवंश 2/53) अर्थात् जो क्षत (नाश, घाव या विपत्ति) से रक्षा करता है, वही वास्तव में क्षत्रिय है। यह श्रेष्ठ शब्द इसी अर्थ में संसार में प्रसिद्ध है। इस प्रजारक्षण-कर्म से नरेन्द्र मोदी क्षत्रिय हैं। इसी प्रेरणा से मैंने कई बार ऐसी बात लिखी है, जिनका प्रमाण 10 वर्ष बाद मिला है।’31 यह महामहोपाध्याय पण्डित अरुणकुमार उपाध्याय का शास्त्रीय अभिमत है और इसका आधार वंशावली नहीं, ‘रक्षण’ को क्षात्रधर्म का प्रधान लक्षण माननेवाली व्याख्या है।

नरेन्द्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में भारतीय राजवंशीय और सांस्कृतिक इतिहास के प्रति उनके दृष्टिकोण के अनेक प्रसंग इस गुण-कर्मपरक विवेचन के साथ रखे जा सकते हैं। 9 मार्च, 2016 ई. को संसद में बड़ौदा राज्य की शिक्षा-व्यवस्था का उल्लेख करते हुए उन्होंने गायकवाड़ शासन के उस ऐतिहासिक प्रयत्न को स्मरण किया, जिसमें कन्याओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए अभिभावकों पर आर्थिक दण्ड की व्यवस्था का उल्लेख था।32 यह प्रसंग देशी रियासतों के इतिहास को केवल सामन्ती अतीत के रूप में न देखकर उनके सामाजिक सुधारों को भी स्मरण करनेवाली दृष्टि को प्रकट करता है।

इसी तरह 31 अक्टूबर, 2018 ई. को सरदार वल्लभभाई पटेल की ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ राष्ट्र को समर्पित करते समय प्रधानमन्त्री ने देशी रियासतों के शासकों के योगदान को स्पष्टतः स्मरण किया— सरदार पटेल के आह्वान पर सैकड़ों रजवाड़ों ने त्याग की मिसाल कायम की और उस त्याग को देश को भूलना नहीं चाहिए। यह कथन प्रधानमन्त्री कार्यालय के आधिकारिक अभिलेख में सुरक्षित है।33

गुजरात के पंचमहल ज़िले की पावागढ़ पहाड़ी के शीर्ष भाग पर 10वीं-11वीं शताब्दी में निर्मित ‘कालिका माता-मन्दिर’34 के शिखर को सुलतान महमूद शाह बेगड़ा (1459–1511 ई.) ने नष्ट कर दिया था और मन्दिर के ऊपर सदानशाह पीर की दरगाह बना दी गयी थी, जिसे नरेन्द्र मोदी ने आपसी सहमति से हटवा कर न केवल मन्दिर के भव्य गगनचुम्बी स्वर्णमण्डित शिखर का निर्माण करवाया, अपितु 18 जून, 2022 ई. को शिखर पर ध्वज स्थापित कर उसका उद्घाटन भी किया। उद्घाटन करने के पश्चात् नरेन्द्र मोदी ने कहा— ‘आज़ादी के 75 साल में भी पाँच सदियों तक महाकाली मन्दिर के ऊपर झण्डा नहीं फहराया गया था। मन्दिर पर फहराया गया झण्डा न केवल हमारी आध्यात्मिकता का प्रतीक है, बल्कि यह भी कहता है कि सदियाँ बीत जाती हैं, युग बीत जाते हैं, लेकिन हमारा विश्वास शाश्वत है।’35

कालान्तर में 11 अक्टूबर, 2022 ई. को उज्जयिनी में ‘श्रीमहाकाल लोक’ का लोकार्पण, 19 फ़रवरी, 2024 ई. को सम्भल में श्रीकल्कि धाम का शिलान्यास तथा 2 मई, 2024 ई. को जामनगर में जाम साहब श्री शत्रुशल्यसिंहजी से भेंट— इन प्रसंगों का सम्बन्ध मोदी की जैविक वंशावली से नहीं, बल्कि उनके सार्वजनिक जीवन में भारतीय धर्म, इतिहास और राजवंशीय स्मृति के स्थान से है। अतः इन्हें वंशगत प्रमाण बनाना अनुचित होगा; इनके माध्यम से केवल सांस्कृतिक दृष्टिकोण का अध्ययन किया जा सकता है।

इसी गुण-कर्मपरक क्षात्रधर्म की साहित्यिक अभिव्यक्ति सन् 2020 ई. में प्रकाशित मेरे ‘कोरोना-शतक’ में मिलती है। उस समय मोदी-परिवार के परमार मूल का 2025 ई. वाला कथन सामने नहीं आया था। वैश्विक महामारी की परिस्थिति में मैंने शासन और प्रजारक्षण को भारतीय पुराणेतिहासिक प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया था—

माघ शुक्ल पंचमी को केरल के सिन्धुतट,

पहुँचा कोरोना का संवाहक प्रथम था।

संक्रमण-रथ में विषाणु के तुरंग जुते,

दिल्ली-आगरा में फूटा कोविड का बम था।

धीरे धीरे पीड़ित-समूह हुआ पंचशत,

फिर भी न भारत का आत्मबल कम था।

मार्च में बाईस को था जनचक्र रुक गया,

विष्णु-रूप मोदी का पराक्रम परम था।।

इस छन्द में महामारी ‘संक्रमण-रथ’ है और विषाणु उसके ‘तुरंग’। ‘विष्णु-रूप’ पद किसी लौकिक व्यक्ति के देवत्व की ऐतिहासिक घोषणा नहीं, भारतीय राजधर्म में पालन और रक्षण के काव्यबिम्ब का प्रयोग है। विष्णु का मूल काव्यात्मक आशय यहाँ ‘पालनकर्ता’ है; अतः संकट में प्रजारक्षण करने वाला शासन उसी प्रतीक में देखा गया है।

विश्वजयी शत्रु जब आया था अदृश्य रूप,

मन में न भूमि कोई दीख पड़ी खंख की।

कोविड-विमान नित्य भारत में उड़ रहा,

किन्तु रण-योजना से गति रुकी पंख की।

शासन की नीतियों के साथ जनता थी खड़ी,

चित्त में न वृत्ति थी कदापि कहीं झंख की।

राष्ट्रव्यापी युद्ध था कोरोना के विरुद्ध छिड़ा,

ध्वनि गूँज उठी ताली-थाली और शंख की।।

यहाँ अदृश्य विषाणु ‘विश्वजयी शत्रु’ है और आपदा-प्रबन्धन ‘रण-योजना’। ताली, थाली और शंख तत्कालीन सार्वजनिक आयोजन के काव्य-प्रतीक बनकर लोकसंग्रह, मनोबल और सामूहिक सहभागिता को अभिव्यक्त करते हैं।

ताली-थाली और शंख बज उठे भारत में,

एकता की शक्ति से प्रसन्न प्रिय प्राण थे।

धर्म की प्रवृत्ति मूल धैर्यव्रत धारे दिखी,

हिन्दूओं के तीर्थ सभी राष्ट्रधर्म-शाण थे।

आपदा-प्रबन्धन में भक्ति-चेतना के सूत्र,

कोविड उन्नीस के विरुद्ध शिरस्त्राण थे।

मोदी के आह्वान पर साथ में प्रजा थी सब,

विष्णु-रूप राजा के ये मौलिक प्रमाण थे।।

‘धैर्यव्रत’ संकट में आत्मसंयम का प्रतीक है और ‘शिरस्त्राण’ सुरक्षा का। ‘विष्णु-रूप राजा’ पुनः पालनकर्ता राजा की साहित्यिक अवधारणा है। यहाँ राजा और प्रजा का सम्बन्ध अधिकार और अधीनता का नहीं, संकट में परस्पर दायित्व का रूप ग्रहण करता है।

कोविड उन्नीस के विरुद्ध महासमर में,

मोदी की अकाट्य नीतियों के साथ देश है।

जैसे जनमेजय ने नागयज्ञ किया ठीक,

वैसे ही कोरोनायज्ञ से न कहीं क्लेश है।

एकता के मन्त्रवाले राष्ट्रसूक्त जाग उठे,

धर्मप्राण जनता में दुःख नहीं लेश है।

एक साथ एक स्वर सिद्ध करता है यह,

विष्णु-रूप मोदी प्रजावत्सल नरेश है।।

यहाँ ‘महासमर’ अगले ही चरण में ‘यज्ञ’ बन जाता है। युद्ध में शत्रु-विनाश प्रधान होता है, यज्ञ में सामूहिक सहभागिता और समर्पण। ‘राष्ट्रसूक्त’ इसी सामूहिक चेतना का रूपक है तथा ‘प्रजावत्सल नरेश’ भारतीय राजधर्म के पालनात्मक पक्ष का संकेत।

हो गये कोरोनाग्रस्त देश महिमण्डल के,

विश्वमारी के विषैले बाण छलने लगे।

मृत्यु-मखकुण्ड में अकल्पनीय प्राणाहुति,

विश्व-राष्ट्र-नायकों के धैर्य ढलने लगे।

जाग उठी चरक-सुश्रुत की प्रयोगशाला,

भारत-वसुन्धरा के पुण्य फलने लगे।

संसृति-सौमित्र को संजीवनी-सी क्लोरोक्वीन,

देने हेतु मोदी-हनुमान चलने लगे।।

यहाँ रामकथा का संजीवनी-प्रसंग विश्वव्यापी संकट के साथ संयोजित है। ‘संसृति-सौमित्र’ संकटग्रस्त विश्व का रूपक है और ‘मोदी-हनुमान’ सहायता पहुँचाने वाले संकटमोचन का। क्लोरोक्वीन का उल्लेख सन् 2020 की तत्कालीन चिकित्सकीय और कूटनीतिक परिस्थिति की साहित्यिक स्मृति है; इसे वर्तमान चिकित्सकीय प्रभावकारिता का कथन नहीं समझना चाहिए।

विश्व के अनेक शक्तिशाली देश लुण्ठित-से,

महामारी-ग्रस्त हैं असंख्य हो गये पुमान।

मृतकों की संख्या थी अकल्पनीय बढ़ गयी,

कर नहीं पाया कोई सचमुच अनुमान।

ट्रम्प आदि भारत के आगे थे पसारे हाथ,

हो गये थे ध्वस्त ऊँची नाकवालों के गुमान।

क्लोरोक्वीन प्राणदा संजीवनी अमोघ दिये,

अन्तहीन विपदा में मोदी हुए हनुमान।।

पिछले छन्द का संजीवनी-रूपक यहाँ पूर्णता प्राप्त करता है। हनुमानत्व का काव्यार्थ बल-प्रदर्शन नहीं, संकट में दूसरे के प्राण बचाने के लिए सक्रिय होना है। इसलिए यह छन्द ‘क्षतात् त्रायते’ वाले रक्षणकर्तृत्व से अर्थगत सम्बन्ध स्थापित करता है।

खड़ा जब राष्ट्र हुआ मोदी के आह्वान पर,

तब एक वर्ग ने चलाये थे विषैले बाण।

मुख से वमन किये घृणा के थे विषतन्तु,

उगले विषाणु-श्वास तबलीगियों के घ्राण।

जाहिल जमातियों के राष्ट्रद्रोही स्वर गूँजे,

आने लगी याद फिर राणा-शिवा की कृपाण।

ऐसे में तटस्थ राष्ट्रधर्म का प्रकाश-पुंज,

विष्णु-रूप शासक की प्रभुता का था प्रमाण।।

यह सन् 2020 के एक विशिष्ट और अत्यन्त तनावपूर्ण सामाजिक प्रसंग में लिखी कवि-प्रतिक्रिया है। इसके कठोर पदों को किसी सम्पूर्ण धार्मिक समुदाय के स्थायी चरित्र-वर्णन के रूप में ग्रहण करना उचित नहीं होगा। छन्द का चरम मूल्य ‘तटस्थ राष्ट्रधर्म’ है—संकट के समय शासन का धर्म नागरिकों के साथ निष्पक्ष व्यवहार और सार्वजनिक सुरक्षा है।

एक ओर राष्ट्रव्रती चेतना है हिन्दुओं की

दूसरी तरफ़ तबलीगियों का तीर है।

देवी की उपासना से अर्जित हुई है शक्ति,

धर्मप्राण जनता का शीतल समीर है।

लॉकडाउन का सूत्र जाहिलों ने तोड़ डाला,

दुर्मुखों ने गन्दा किया संस्कृति का नीर है।

फिर भी कोरोना के विरुद्ध लड़ रहा एक,

विष्णु-रूप मोदी सिद्ध साधक फकीर है।।

इस छन्द का सर्वाधिक अर्थगर्भित पद ‘सिद्ध साधक फकीर’ है। ‘राजा’ से ‘फकीर’ तक की यह यात्रा अधिकार से अनासक्ति की ओर जाती है। भारतीय राजर्षि-अवधारणा में राजसत्ता और आत्मसंयम के जिस समन्वय की कल्पना है, यहाँ उसका आधुनिक काव्यात्मक रूप दिखाई देता है।

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी रात्रि का मुहूर्त ठीक,

नौ बजे कोरोनासुर हाथ लगा मलने।

शत्रु-बुद्धि नाश हेतु मंगलाचरण दिव्य,

शुभता का भाव लगा मानस में पलने।

राष्ट्रवासियों ने श्रद्धा-भक्ति से मनाया पर्व,

घर घर में लगा महोत्सव मचलने।

श्री नरेन्द्र मोदी के निदेश में प्रसन्नचित्त,

शुभकामना का शुभ्र दीप लगा जलने।।

‘कोरोनासुर’ महामारी का पौराणिक रूपान्तरण है और ‘शुभ्र दीप’ भय के अन्धकार के सम्मुख आशा, शुभता और सामूहिक मनोबल का प्रतीक। इस छन्द में युद्ध का बाह्य रूप अन्तर्मन की विजय में परिवर्तित हो जाता है।

देवता समान वयोवृद्ध परिवार में जो,

उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध अष्टयाम हो।

पालन अवश्य करें शासन की नीतियों का,

रोगरोधी-क्षमता से व्यक्ति बलधाम हो।

आयुष का ऐप हो मोबाइल में विद्यमान,

दीन की मदद, अधीनस्थ भी ललाम हो।

श्वेत-नीली-खाकी का सम्मान जन जन करें,

मोदी-सप्तपदी से भविष्य अभिराम हो।।36

इस अन्तिम छन्द में सम्पूर्ण प्रतीक-योजना नागरिक धर्म में पर्यवसित होती है— वयोवृद्धों की रक्षा, अनुशासन, दीनजन की सहायता तथा चिकित्सा और सुरक्षा-कर्मियों का सम्मान। इस प्रकार छन्द 66–75 की अर्थयात्रा है— शत्रु → युद्ध → लोकसंग्रह → यज्ञ → सेवा → प्राणरक्षण → प्रतिरोध → साधना → मनोबल → नागरिक धर्म।

इसी कालखण्ड में प्रकाशित ‘श्रीराम की अयोध्या’ में मैंने 5 अगस्त, 2020 ई. के श्रीरामजन्मभूमि-मन्दिर भूमिपूजन का वर्णन करते हुए लिखा

था— ‘आस्था के महासागर में आकण्ठ डूबी भगवान् श्रीराम की राजधानी अयोध्या में बुधवार 5 अगस्त, 2020 ई. को 12 बजकर 44 मिनट 8 सेकेंड का समय पूर्ण होते ही भक्ति के पुनीत इतिहास में वह शुभ घड़ी आ ही गयी, जिसकी प्रतीक्षा करोड़ों रामभक्त शताब्दियों से कर रहे थे। नवोढ़ा-सी सुसज्जित, युवती पुराणी अयोध्या भगवा रंग में रँगी हुई थी। अयोध्या की यह चारुचन्द्रांकित सुषमा अभिनव विक्रमादित्य श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की उपस्थिति से शतगुणित हो रही थी। श्रीरामजन्मभूमि-मन्दिर का भूमिपूजन एवं शिलान्यास करने पहुँचे लोकतन्त्र के मन्दिर के यशस्वी सम्राट् ने राजनीतिक परिधान से पृथक् भारतीय संस्कृति एवं परम्परा के अनुकूल सुनहरा कुर्ता, श्वेत धोती एवं भगवा अंगवस्त्र धारण कर रखा था। एक सनातनी रामभक्त के रूप में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने वैदिक विधि-विधान के साथ श्रीरामजन्मभूमि-मन्दिर-निर्माण के लिए भूमिपूजन किया।’37

इस उद्धरण का वर्तमान शोध के साथ एक विलक्षण साहित्यिक सम्बन्ध है। सन् 2020 ई. में नरेन्द्र मोदी के लिए ‘अभिनव विक्रमादित्य’ पद का प्रयोग हो चुका था; परिवार की परमार-राजपूत कुलस्मृति का स्पष्ट सार्वजनिक कथन पाँच वर्ष बाद सामने आया। मैंने समाधि की अवस्था में ‘विष्णु-रूप राजा’, ‘विष्णु-रूप मोदी’ और ‘अभिनव विक्रमादित्य’ लिखा था। भारतीय परम्परा कवि को मन्त्रद्रष्टा मानती है— ‘कवयो मन्त्रद्रष्टारः।’ काव्यात्मक अन्तर्दृष्टि इतिहासकार के अभिलेखीय प्रमाण का विकल्प नहीं होती; किन्तु पूर्ववर्ती साहित्यिक प्रतीक और बाद में सामने आयी वंशस्मृति के बीच यह साम्य साहित्येतिहास और लेखक की सर्जनात्मक चेतना—दोनों की दृष्टि से उल्लेखनीय है।

ज्योतिर्विद् आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री का अभिमत भी इसी सन्दर्भ में उल्लेखनीय है— ‘बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि मोदी जी का वंश ‘मोढ़’ है। उस समय मोढ़, मैढ़ का अपभ्रंश लगा था और प्रतीत हो रहा था कि वे क्षत्रिय कुल से हैं, किन्तु अब जब उनके भाई ने स्वयं स्वीकारा है, तो स्पष्ट हो गया है कि वे क्षत्रिय कुल से हैं। वैसे मोदीजी का व्यवहार और उनकी जीवन-शैली किसी सात्विक सन्त से कम नहीं है और वे एक महान् संन्यासी जैसे शासक हैं। इसलिए उनका वर्ण केवल राष्ट्र है। वे राष्ट्र के प्रतीक हैं और विश्व में भारत का डंका उन्हीं के कारण बज रहा है।’38 यह आचार्य जी का वैयक्तिक विद्वत्-अभिमत है; इसे वंशावली के स्वतन्त्र ऐतिहासिक प्रमाण के स्थान पर उसी रूप में ग्रहण करना चाहिए।

आधुनिक धार्मिक जगत् में नरेन्द्र मोदी को प्रदत्त विरुदों में भी ‘राजर्षि’ और ‘धर्मरक्षण’ की अवधारणा बार-बार सामने आती है। 3 मई, 2017 ई. को हरिद्वार में पतंजलि अनुसन्धान संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर स्वामी रामदेव ने उन्हें ‘राष्ट्रर्षि’ के रूप में सम्मानित किया। 28 जून, 2025 ई. को आचार्य विद्यानन्दजी महाराज की जन्मशती के अवसर पर जैनाचार्य प्रज्ञासागर ने ‘धर्मचक्रवर्ती’ विरुद प्रदान किया। ये धार्मिक संस्थाओं और धर्माचार्यों द्वारा किये गये सांस्कृतिक मूल्यांकन हैं, न कि संवैधानिक अथवा वंशावलीगत पदनाम।

28 नवम्बर, 2025 ई. को उडुपी श्रीकृष्ण मठ में लक्षकण्ठ गीता-पारायण के अवसर पर श्रीपुथिगे मठ के स्वामी सुगुणेन्द्र तीर्थ का संस्कृत उद्बोधन इस सन्दर्भ में विशेष अर्थ रखता है—

‘...अस्मिन् दिवसे अस्माकं सर्वेषां कृष्णभक्तानां महान् सन्तोषः संजातः। अस्माकं प्रधानमन्त्री श्रीनरेन्द्र मोदी महोदयः लक्षकण्ठगीतापठना सन्दर्भे आगताः। नरेन्द्र मोदी महोदयः अर्जुन इव। अर्जुनः इन्द्रावतारः। श्रीमध्याचार्याः वदन्ति अर्जुने नरावेशः वर्तते। अतः नरेन्द्र शब्दस्य अर्थः साक्षात् अर्जुनः। यत्र गीता प्रचलति तत्र अर्जुनः आगतः। अतः अर्जुन आगमनेन अस्माकं लक्षकण्ठगीतासमर्पणं सम्पूर्णं इति वयं भावयामः। ... श्रीकृष्णः ‘उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्’ इति सन्देशं दत्तवान्। अस्माकं नरेन्द्र मोदी महोदयः आत्मनिर्भरकार्यक्रमेण श्रीकृष्णसन्देशस्य अनुष्ठानं कृतवन्तः। श्रीकृष्णः निःस्वार्थसेवां करोतु इति। अस्माकं नरेन्द्र मोदी महोदयः निःस्वार्थ सेवया गीतासन्देशं कृतवन्तः। अतः नरेन्द्र मोदी महोदयः भगवद्गीतायाः जीवत् व्याख्यानं इति वयं भावयामः।... श्रीकृष्णः गीतायां धर्मस्य रक्षणं आवश्यकं धर्मस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। तादृश सन्देशं नरेन्द्र मोदी महोदयः निष्पक्षपातरूपेण सज्जनानां रक्षणं दुष्टानां शिक्षणञ्च कुर्वन् वर्तते। अतः श्रीकृष्णस्य अनुग्रहः विशेष रूपेण भवतु। धर्मद्वारा जगद्रक्षणं विश्वनायकस्य भवतु इति वयं आशास्महे। अस्माकं पर्यायः विश्वगीता पर्यायः। विश्वगीता पर्याये विश्वनायकः आगतः इति सार्थकममिते। अस्माकं आशयः वर्तते तादृश नरेन्द्र मोदी महोदयद्वारा धर्मरक्षणं भवतु इति अस्माभिः प्रार्थना क्रियते। शास्त्रे धर्मो रक्षति रक्षितः इति घोषणं कृतम्। अस्माभिः मोदी रक्षति रक्षितः। यदि मोदी रक्षितः धर्मः देशः रक्षितः। मोदी हस्ते समग्र विश्वं सुरक्षितं वर्तते इति अस्माकं भावना। तादृशा अनुग्रहः श्रीकृष्णस्य अनुग्रहः भवतु इति प्रार्थनां कृत्वा। नरेन्द्र मोदी महोदयस्य अस्मिन् दिवसे श्रीकृष्णानुग्रहः रूपेण एकं प्रशस्तिं वयं ददामः। भारतभाग्यविधाता। अस्माकं नरेन्द्रमोदी महोदयः भारतभाग्यविधाता इति विरुद समर्पणेन विशेष कृष्णानुग्रहं वयं प्रार्थयामः।...’

इसका हिन्दी भाव यह है कि स्वामी सुगुणेन्द्र तीर्थ नरेन्द्र मोदी को अर्जुन-सदृश बताते हैं; आत्मनिर्भरता को गीता के आत्मोद्धार-सन्देश तथा सार्वजनिक सेवा को निष्काम कर्म से जोड़ते हैं। उनके उद्बोधन का केन्द्रीय सूत्र धर्मरक्षण है— सज्जनों का रक्षण, दुष्टों का शिक्षण और अन्ततः ‘मोदी रक्षति रक्षितः।’ इस धार्मिक-सांस्कृतिक अभिमत का ‘रक्षण’ कालिदास के ‘क्षतात्किल त्रायते’ के साथ अर्थगत साम्य रखता है।

पूर्व प्रधानमन्त्रियों के सम्बन्ध में भी ऐसे विरुद सर्वथा अनुपस्थित नहीं रहे। पण्डित जवाहरलाल नेहरू से डॉ. मनमोहन सिंह तक उपलब्ध प्रमुख जीवनचरितों और आत्मकथात्मक साहित्य में एकमात्र पूर्व प्रधानमन्त्री विश्वनाथप्रताप सिंह को ‘काशीविद्वत्परिषद्’ द्वारा ‘राजर्षि’ विरुद से अलंकृत करने का प्रसंग मिलता है। विश्वनाथप्रताप सिंह स्वतन्त्रता के पूर्व 1941 ई. से 1947 ई. तक स्वयं माण्डा के राजाबहादुर थे। अतः आधुनिक लोकतन्त्र में ‘राजर्षि’, ‘राष्ट्रर्षि’, ‘धर्मचक्रवर्ती’ और ‘भारतभाग्यविधाता’ जैसे विरुद संवैधानिक पदनाम नहीं, धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यांकन हैं।

इस सम्पूर्ण अनुशीलन से प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के क्षत्रियत्व का प्रश्न दो पृथक् धरातलों पर सामने आता है। प्रथम है वंशगत-सामाजिक इतिहास। इसमें 2025 ई. की पारिवारिक कुलस्मृति अपने पूर्वजों को मेवाड़ के परमार राजपूतों से जोड़ती है; 1891 ई. की रिपोर्ट-मरदुमशुमारी राजमारवाड़ राजपूतों के घाणी और तेल-व्यवसाय ग्रहण करने से घाँची न्यात बनने की परम्परा अभिलिखित करती है तथा परमार को उसके गोत्रों में सर्वप्रथम रखती है; परमार शाखा-सूचियों में मोरी आता है; पश्चिमी भारतीय इतिहास-लेखन में मोरी और मौर्य को परस्पर सम्बद्ध करके पढ़ा गया है; प्राचीन बौद्ध-साहित्य मोरियों को क्षत्रिय कहता है; और ग्यारहवीं शताब्दी का वाघली मौर्य-अभिलेख स्वयं अपने मौर्य राजवंश को मनु, मान्धाता और सूर्यवंश से सम्बद्ध करता है।

दूसरा धरातल है गुण-कर्मपरक क्षात्रधर्म। कालिदास के ‘क्षतात्किल त्रायते’ में क्षत्र का मूलार्थ रक्षण है। महामहोपाध्याय पण्डित अरुणकुमार उपाध्याय इसी आधार पर नरेन्द्र मोदी के प्रजारक्षण-कर्म को क्षात्रत्व से सम्पृक्त करते हैं; ‘कोरोना-शतक’ में ‘विष्णु-रूप राजा’, ‘मोदी-हनुमान’, ‘प्रजावत्सल नरेश’ और ‘सिद्ध साधक फकीर’ उसी रक्षणकर्तृत्व की साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ हैं; ‘श्रीराम की अयोध्या’ का ‘अभिनव विक्रमादित्य’ सांस्कृतिक प्रतीक है; और समकालीन धर्माचार्यों के ‘राष्ट्रर्षि’, ‘धर्मचक्रवर्ती’, ‘मोदी रक्षति रक्षितः’ और ‘भारतभाग्यविधाता’ जैसे विरुद उनके अपने धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यांकन को व्यक्त करते हैं।

वंशगत शृंखला के सम्बन्ध में इतिहास की कठोर मर्यादा भी उतनी ही स्पष्ट है। अभी मोदी-परिवार की दस पीढ़ियों को मेवाड़ के किसी निश्चित परमार कुल से जोड़नेवाली अखण्ड मध्यवर्ती अभिलेखीय वंशावली सामने नहीं है। परिवार के मेवाड़ स्थित मूलस्थान, विशिष्ट परमार शाखा, गोत्र, कुलदेवी, भाट-बही, विवाह-सम्बन्ध और गुजरात में आरम्भिक बसावट के अभिलेख इस अनुसन्धान की अगली अपेक्षित सामग्री हैं। इसलिए पारिवारिक स्मृति को निराधार कहकर अस्वीकार करना और उसी के आधार पर सहस्राब्दियों की प्रत्येक मध्यवर्ती पीढ़ी को प्रमाणित मान लेना— दोनों इतिहास-पद्धति के लिए अनुचित होंगी।

इस अध्ययन का महत्त्व इसी मध्यभूमि में है। उपलब्ध प्राचीन साहित्य, अभिलेख, राजवंशीय शाखा-सूचियाँ, औपनिवेशिक जनगणना-वृत्तान्त, आधुनिक नृवंशविज्ञान और पारिवारिक कुलस्मृति को एक ही प्रमाण-स्तर पर न रखकर उनके पारस्परिक सम्बन्धों का परीक्षण करने पर एक दीर्घ अनुसन्धान-सूत्र सामने आता है— सूर्यवंश → इक्ष्वाकु → शाक्य → मोरिय → मौर्य → मोरी → परमार → घाँची → मोदी।

यह सूत्र स्वयं अन्तिम वंशावली नहीं, बल्कि उपलब्ध स्रोतों से निर्मित ऐतिहासिक अनुसन्धान-शृंखला है। इसके कुछ सोपान प्राचीन ग्रन्थों से समर्थित हैं, कुछ अभिलेख से, कुछ मध्यकालीन और आधुनिक वंशपरम्परा से, कुछ समुदाय-स्मृति से और अन्तिम सोपान परिवार की स्वयं व्यक्त कुलस्मृति से। इस भेद को सुरक्षित रखते हुए किया गया अनुसन्धान ही आगे इस प्रश्न को अधिक निश्चित ऐतिहासिक निष्कर्ष तक पहुँचा सकता है। इस प्रकार ‘प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का क्षत्रियत्व’ केवल किसी आधुनिक जाति-संज्ञा का प्रश्न नहीं रह जाता; वह भारतीय इतिहास में वंश, वर्ण, वृत्ति, प्रव्रजन, सामाजिक रूपान्तरण, कुलस्मृति और राजधर्म के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन का व्यापक विषय बन जाता है।

सन्दर्भ एवं टिप्पणियाँ

1. प्रह्लाद मोदी : मोदी-परिवार के मेवाड़, परमार-राजपूत मूल तथा तिल-तेल व्यवसाय सम्बन्धी वक्तव्य, 20 नवम्बर 2025 ई.; लेखक के पास सुरक्षित वक्तव्य।

2. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग : भारत सरकार; गुजरात में Modh-Ghanchi को राज्य OBC सूची में सम्मिलित करने की अधिसूचना, 25 जुलाई, 1994 ई.; NCBC की केन्द्रीय सूची हेतु संस्तुति, 15 नवम्बर, 1997 ई.; भारत सरकार की राजपत्र-अधिसूचना, 27 अक्टूबर, 1999 ई.। आधिकारिक विवरण के लिए पत्र सूचना कार्यालय/NCBC।

Press Information Bureau

3. रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह : रिपोर्ट-मरदुमशुमारी राजमारवाड़ सन् 1891 ई. (Marwar Census Report 1891): राजस्थान की जातियों का इतिहास एवं रीतिरिवाज, प्रस्तावना— प्रो. ज़हूरखाँ मेहर, महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केन्द्र, मेहरानगढ़ फोर्ट, जोधपुर, प्रथम संस्करण 1894, द्वितीय संस्करण 1997, प्रस्तुत संस्करण 2010, ‘घाँची’, पृ. 493

4. रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह : तदेव, पृ. 493

5. रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह : तदेव, पृ. 494

6. रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह : तदेव, पृ. 494

7. रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह : तदेव, पृ. 495

8. पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र : जातिभास्कर, आर्यावर्त्त संस्कृति संस्थान, डी–48, गली नं. 3, दयालपुर, करावलनगर रोड, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2023 ई., पृ. 512

9. Press Trust of India : ‘PM Modi’s brother asks Teli community to adopt ‘Modi’ prefix’, 20 नवम्बर, 2016

10. पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र : जातिभास्कर, पृ. 588, श्लोक 114–117

11. पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र : तदेव, पृ. 588, श्लोक 118–119

12. पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र : तदेव, वर्णसंकरजातिविवेकाध्याय, पृ. 615–616, श्लोक 318–320

13. Dīgha Nikāya, Vol. II, Mahāparinibbāna Sutta, Pali Text Society, 1903, p. 166–167; तुलनीय—T. W. Rhys Davids (tr.), Buddhist Suttas, Sacred Books of the East, Vol. XI, pp. 134–135। पिप्पलिवन के मोरियों द्वारा क्षत्रियत्व के आधार पर बुद्ध के धातु-अवशेषों में भाग का दावा।

14. Hemchandra Raychaudhuri : Political History of Ancient India, चन्द्रगुप्त-मौर्य की उत्पत्ति सम्बन्धी विवेचन, पृ. 138–139; Mahāvaṃsa, Geiger’s translation, p. 27; Divyāvadāna, ed. E. B. Cowell and R. A. Neil, Cambridge, 1886, pp. 370, 409; Mahāparinibbāna Sutta, SBE XI, pp. 134–135

15. (क) डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी : चन्द्रगुप्त मौर्य और उनका काल (अनुवादक– मुनीश सक्सेना), पृ. 33–34; (ख) B. C. Law : Age of Imperial Unity, Bombay, p. 17; (ग) Hemchandra Raychaudhuri : Political History of Ancient India, Calcutta (1965). p. 194

16. कुछ मध्यकालीन अभिलेखों में खानदेश के मौर्यों को मान्धातृ नामक सूर्यवंशी-नरेश का वंशज कहा गया है। उत्तरी मैसूर के कुछ अभिलेखों में चन्द्रगुप्त मौर्य को क्षत्रिय कहा गया है। (Epigraphia Indica, Vol. 11. P. 222)। ‘राजपुताना गज़ेटियर’ में मोरी नामक जाति की गणना राजपूतों में की गयी है। कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थान के मोरी राजपूत को ही मौर्य माना है। आचार्य क्षेमेन्द्र ने भी सम्राट् अशोक को सूर्यवंशी बताया है तथा ‘अवदानकल्पलता’ में अशोक को ‘सौर्यमौर्यमहावंश पंचानन श्रीमदशोकदेव’ कहा गया है। डॉ. श्रीभगवान सिंह एवं श्री तनेसिंह सोढ़ा काठा के अर्वाचीन अनुसन्धान से भी सिद्ध होता है कि मौर्य शासक सुर्यवंशी क्षत्रिय थे।

17. राधाकुमुद मुकर्जी : चन्द्रगुप्त मौर्य और उनका काल (अनु. मुनीश सक्सेना), पृ. 34

18. राधाकुमुद मुकर्जी : तदेव, पृ. 28

19. F. E. Pargiter, The Purana Text of the Dynasties of the Kali Age, London 1913, p. 26, footnote 35

20. वंसत्थप्पकासिनी (मललसेकर द्वारा सम्पादित), भाग 1, पृ 180

21. वंसत्थप्पकासिनी, भाग 1, पृ 180

22. (क) B. C. Law : A History of Pali Literature, Vol. II (London, 1933), p. 596; (ख) राधाकुमुद मुखर्जी : चन्द्रगुप्त मौर्य और उनका काल, पृ. 33

23. Epigraphia Indica, Vol. II : ‘Stone Inscriptions at Vāghlī in Khandesh’, pp. 221–228, विशेषतः p. 225; शक 991 के मौर्य अभिलेख में मनु–सूर्यवंश–मान्धाता–मौर्यवंश सम्बन्धी वंशप्रशस्ति।

24. A. C. L. Carlleyle : Report of a Tour in Eastern Rajputana in 1871–72 and 1872–73, Archaeological Survey of India, चित्तौड़ के Mori/Mauri/Maurya शासकों सम्बन्धी विवेचन, pp. 232–233।

25. James Tod : Annals and Antiquities of Rajasthan, Vol. I, ‘The Pramaras—Thirty-Five Sakha of the Pramaras’, p. 111: ‘Mori [or Maurya]’; उपलब्ध मूल संस्करण में Mori/Maurya, Chandragupta तथा गुहिलों से पूर्व चित्तौड़ के शासकों का सम्बन्ध स्पष्टतः अंकित है।

26. डॉ. डी. सी. गांगुली : परमार राजवंश का इतिहास, अनुवादक— पण्डित लक्ष्मीकान्त मालवीय, प्रकाशन केन्द्र, डालीगंज रेल्वे क्रॉसिंग, सीतापुर रोड, लखनऊ, द्वितीय संस्करण, 2024 ई., पृ. 17; परमारों की पैंतीस शाखाओं की सूची में ‘मोरी’ प्रथम।

27. K. S. Singh (ed.) : People of India: Dadra and Nagar Haveli, Anthropological Survey of India, 1992, ‘Mauri Rajput’ सम्बन्धी विवरण।

28. आचार्य श्री हस्तीमलजी महाराज : जैन धर्म का मौलिक इतिहास, द्वितीय भाग— केवली व पूर्वधर-खण्ड, जैन इतिहास समिति, जयपुर, चतुर्थ संस्करण, 2001 ई., सम्प्रति तथा उज्जयिनी की उत्तरवर्ती राजपरम्परा सम्बन्धी विवेचन; साथ ही मेरुतुङ्ग, विचारश्रेणि, ‘तद्वंशे एव गर्दभिल्लो राजा…’ तथा ‘तदनु गर्दभिल्लस्यैव सुतेन विक्रमादित्येन…’ सम्बन्धी पाठ।

29. मुनि कल्याणविजय गणी : वीर निर्वाण संवत् और जैन काल-गणना, शारदाबेन चिमनभाई एज्युकेशनल रिसर्च सेन्टर, अहमदाबाद, संस्करण 2000 ई., पृ. 56 तथा पृ. 143–144; बलमित्र–विक्रमादित्य तादात्म्य तथा मेरुतुङ्गीय विक्रमादित्य-परम्परा का विवेचन।

30. महाकवि कालिदास : रघुवंश 2/53

31. महामहोपाध्याय पण्डित अरुणकुमार उपाध्याय : प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के क्षात्रत्व के सम्बन्ध में लेखक को प्रदत्त अभिमत।

32. नरेन्द्र मोदी : राज्यसभा वक्तव्य, 9 मार्च, 2016 ई.; https://m.youtube.com/watch?v=FKwHs2bfvTs

33. प्रधानमन्त्री कार्यालय, भारत सरकार : ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ राष्ट्रार्पण, केवडिया, 31 अक्टूबर, 2018 ई.; देशी रियासतों के शासकों के त्याग सम्बन्धी वक्तव्य।

34. Dr. Shivananda V. & Atul Bhargava : Champaner Pavagadh, Archaeological Survey of India, First Edition 2009, p. 3

35. प्रधानमन्त्री कार्यालय, श्रीकालिका माता के पुनर्विकसित मन्दिर का उद्घाटन, पावागढ़, 18 जून, 2022 ई.।

36. डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह ‘संजय’ : कोरोना-शतक, प्रथम संस्करण, 2020 ई., छन्द संख्या 66–75, पृ. 67–72।

37. डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह ‘संजय’ : श्रीराम की अयोध्या, प्रथम संस्करण, 2020 ई., पृ. 568।

38. ज्योतिर्विद् आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री : प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के वंश और व्यक्तित्व के सम्बन्ध में लेखक को प्रदत्त अभिमत।

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