Saturday, September 18, 2021
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बरसात के दिनों में झोपड़ी में रहने को मजबूर एक गरीब परिवार

सोनभद्र। आम जनता की भलाई के लिए केंद्र व राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही तमाम आवास योजनाओं के बाद भी कुछ पात्र गरीब तबके के लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है जिससे बरसात आते ही अब गांवो में ऐसे गरीब परिवार के लोग जो अपने कच्चे मिट्टी के मकानों की मरम्मत तक नहीं कर पा रहे ,वह लोग मिट्टी का घर गिरने के डर से अपनी जान बचाने के लिए झोपड़ी लगाकर रहने को मजबूर है।बरसात के मौसम में झोपड़ी डाल बाहर रहने से जहां एक तरफ विसैले जीवों के काटने का डर उन्हें सताता रहता है वहीं दूसरी तरफ बरसात में घर गृहस्थी के सामानों के पानी मे भीगने का।आखिर ये गरीब जाएं तो जाएं कहाँ एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ कुआं।

ऐसा नहीं कि गांव में गरीबों के लिए सरकारी आवास नहीं बन रहे,पर ऐसा लगता है कि आवास आवंटन के लिए जो आवश्यक चढ़ावा ,जो कि प्रधान या फिर ग्रामपंचायत अधिकारी या फिर कोई अन्य सरकारी अधिकारी जो कि इस आवास आवंटन के लिए जिम्मेदार हो,तक इन गरीबों की पहुँच नहीं हो पा रही हो या फिर यह उक्त चढ़ावे की रकम का इंतजाम कर पाने में समर्थ न हों।इस बात से यह तो बिलकुल ही सत्य प्रतीत होता है कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो गरीब के गरीबी की सुनवाई कही नहीं है तथा इस तरह की तस्वीर सरकारी अफसरों की संवेदनशीलता व उनकी निर्लज्जता की कहानी बयां करने के सबूत के तौर पर हर तरफ देखी जा सकती हैं।

यहां यूपी के सोनभद्र जिले के सुदूरवर्ती जंगल मे बसे सरईगढ़ गांव में रहने वाला एक परिवार राम धनेश्वर का है जो टूटे – फूटे कच्चे घर में रहने को मजबूर है और जो कभी भी गिर सकता है और बड़ी घटना घट सकती है ने अपनी दर्द भरी कहानी बयां करते हुए बातचीत में राम धनेश्वर ने बताया कि उनका घर मिट्टी का है जिसकी दीवार दो बार गिर चुकी है किसी तरह से मरम्मत कर उसमें गुजारा करने को विवश हैं।वह अपने घर में अपने तीन बेटों के साथ रहते हैं जिसमें से उनके दो बेटे राजेश और पप्पू विकलांग हैं और उनका तीसरा लड़का मनोज की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है ।

उनके पास जमीन भी नहीं है इसकी वजह से घर का खर्चा चलाने के लिए उन्हें मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करना पड़ता है।जब उनसे यह जानकारी चाही गई कि क्या उन्हें प्रधानमंत्री आवास या फिर मुख्यमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिला तो उनका जबाब था कि प्रधान जी का कहना था कि योजना में तुम्हारा नाम नहीं है अब नाम डलवाने के लिये अधिकारियों की जेब गर्म करनी पड़ेगी।ऐसे में मेहनत मजदूरी कर परिवार का पेट भरूँ या फिर अधिकारियों की जेब।उसकी आँखों में विवशता के आँसू व व्यवस्था के प्रति आक्रोश दोनों एक साथ दिखते हैं।यह कहानी किसी एक धनेश्वर की नहीं अपितु हर गांव में सरकारी कर्मचारियों के असम्बेदनशीलता व निष्क्रियता की ऐसी दो चार कहानियां मिल जाएंगी।

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