Friday, August 6, 2021
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दिल्ली HC की बड़ी टिप्पणी, देश को समान नागरिक संहिता की जरूरत, सरकार को करना चाहिए विचार

एक कोर्ट केस के फैसले में हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी की है। आर्टिकल 44 के तहत समान नागरिक संहिता लागू करने का वक्त आ चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से कहा गया है कि सरकार को समान नागरिक संहिता पर विचार करना चाहिए।

नई दिल्ली । यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है देश में हर नागरिक के लिए एक समान कानून का होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति से ताल्लुक क्यों न रखता हो। इसको लेकर देश में समय-समय पर बहस चलती रहती है और कई धरों की ओर से इसे लागू करने की मांग भी की जाती रही है। लेकिन अब कॉमन सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा बयान सामने आया है।

दिल्ली हाई कोर्ट की तरफ से कहा गया कि देश को अब समान नागरिक संहिता की जरूरत है। तलाक को लेकर एक कोर्ट केस के फैसले में हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी की है। आर्टिकल 44 के तहत समान नागरिक संहिता लागू करने का वक्त आ चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से कहा गया है कि सरकार को समान नागरिक संहिता पर विचार करना चाहिए। 

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है देश में हर नागरिक के लिए एक समान कानून का होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति से ताल्लुक क्यों न रखता हो। इसको लेकर देश में समय-समय पर बहस चलती रहती है और कई धरों की ओर से इसे लागू करने की मांग भी की जाती रही है। लेकिन अब कॉमन सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा बयान सामने आया है।

दिल्ली हाई कोर्ट की तरफ से कहा गया कि देश को अब समान नागरिक संहिता की जरूरत है। तलाक को लेकर एक कोर्ट केस के फैसले में हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी की है। आर्टिकल 44 के तहत समान नागरिक संहिता लागू करने का वक्त आ चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से कहा गया है कि सरकार को समान नागरिक संहिता पर विचार करना चाहिए। 

दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा?

 दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 44 की धारणा को हकीकत का रूप देने का वक्त आ गया है। देश बदल रहा है और लोग जाति-धर्म के बंधन से ऊपर उठ रहे हैं। देश में पारंपरिक बाधाएं भी अब कम हो रही हैं। कुछ मामलों में शादी के बाद तलाक में युवाओं को परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों से निपटने के लिए देश में  यूनियन सिविल कोड लागू करने की जरूरत है। 

क्या था पूरा मामला

दिल्ली HC की बड़ी टिप्पणी,  देश को समान नागरिक संहिता की जरूरत, सरकार को करना चाहिए विचार

जस्टिस प्रतिभा एम सिंह के समक्ष एक मामला आया था। जिसमें एक दंपत्ति 2012 में विवाह के बंधन में बंधा था। पति ने फैमिली कोर्ट के समक्ष तलाक के लिए याचिका दाखिल की। लेकिन पत्नी ने कहा कि वो राजस्थान से संबंध रखती हैं। मीणा जनजाति से आती हैं तो हिन्दू मैरिज एक्ट के प्रावधान उनपर लागू नहीं होते हैं। हुआ भी कुछ ऐसा ही और पति कि तलाक की अर्जी खारिज हो गई। इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में पति के द्वारा चैलेंज किया गया। कोर्ट ने पति की अपील को स्वीकार करते हुए यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की जरूरत महसूस की। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा कि इस फैसले को कानून मंत्रालय के पास भेजा जाए ताकि कानून मंत्रालय इस पर विचार कर सके।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड?

आजादी के बाद जब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पहले कानून मंत्री बीआर आंबेडकर ने समान नागरिक संहिता लागू करने की बात की, उस वक्त उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। नेहरू को भारी विरोध के चलते हिंदू कोड बिल तक ही सीमित रहना पड़ा था और संसद में वह केवल हिंदू कोड बिल को ही लागू करवा सके, जो सिखों, जैनियों और बौद्धों पर लागू होता है।  

संघ का संकल्प और बीजेपी के घोषणापत्र का हिस्सा

यूनिफॉर्म सिविल कोड आरएसएस और जनसंघ के संकल्प में रहे तो बीजेपी के मेनिफेस्टों में ही बरसों तक बने रहे। गठबंधन सरकारों के दौर में बीजेपी ने हमेशा इन विवादित मुद्दे से खुद को दूर रखा। लेकिन अब केंद्र में मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार है। लोकसभा में तो बीजेपी का पूरा दम है ही राज्यसभा में भी उसने तीन तलाक और 370 के खात्मे के फैसले पारित करवा लिए।  

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