Saturday, September 18, 2021
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बेरोजगारी और महंगाई का मुद्दा गायब जातीय समीकरण को लेकर सियासी जंग शुरू:लगता है कि चुनाव नजदीक है

सोनभद्र में सभी विभागाध्यक्षों को अपने-अपने विभाग से जुड़ी रोजगार जानकारी शासन को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जा चुके हैं। बसपा, सपा और भाजपा के समय में उपलब्ध कराए गए रोजगार के तुलनात्मक विवरण के साथ अधिकांश विभागों ने ब्यौरा भी शासन को भेज दिया है। इसको 2022 के सियासी समर से जोड़ते हुए चर्चाएं तेज हो गई है।

सोनभद्र । आगामी विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर सभी पार्टियों में घमासान मची है। अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए पार्टियां जहाँ एक तरफ लोगों को अपना पिछला काम काज गिनाने में लगी हैं वहीं दूसरी तरफ सभी पार्टियों द्वारा जातीय समीकरण के हिसाब से गोटियाँ फिट की जाने लगी हैं।ऐसा लगता है उत्तर प्रदेश के इस बार के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण मतदाता चुनाव के केंद बिंदु रहेंगे। चुनाव के नजदीक आते ही विकास का मुद्दा जैसे गायब ही होने लगा है। वैसे महंगाई और बेरोजगारी को लेकर प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा सरकार पर निशाना साध तो रही है परन्तु विपक्ष के आरोपों की धार को कुंद करने के लिये सत्ता पक्ष की तरफ से भी विभिन्न कार्यक्रमों और जनता के बीच जाकर अपनी उपलब्धियां गिनाने की होड़ दिखने लगी है। सूबे के सत्ता पर काबिज होने के सियासी समर को लेकर जिले से रोजगार सहित अन्य मसलों को लेकर आंकड़े जुटाने और एक-दूसरे के खिलाफ राजनीतिक बिसात बिछाने का खेल शुरू हो गया है। इस काम में विपक्षी दलों के साथ सत्ता पक्ष ने भी तेज दौड़ लगानी शुरू कर दी है। कार्यकाल के आखिरी छह महीने में जहां सरकार खुद को रोजगार मोड में दिखाकर वोटरों को अपने साथ जोड़े रखने की कोशिश में जुटी हुई है। वहीं बसपा और सपा के शासन काल में हुए घोटालों की याद भी दिलाई जा रही है।

ब्राह्मण वोटरों को लुभाने की कवायद तेज वर्ष 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आने के साथ ही सत्ता पक्ष के साथ साथ विपक्षी दलों में भी छटपटाहट साफ दिखने लगी है। बसपा ने जहां सोनभद्र में 18 अगस्त को प्रस्तावित प्रबुद्ध वर्ग के सम्मान, सुरक्षा व तरक्की से जुड़ी विचार गोष्ठी के जरिए ब्राह्मण वोटरों को लुभाने की कवायद तेज कर दी है। इस सम्मेलन के सहारे बसपा ने ब्राह्मण मतदाताओं में पैठ बनाने तथा भाजपा के शासन में उनकी जातिगत उपेक्षा से उपजी हताशा का चुनाव में समुचित लाभ लेने के उद्देश्य से ही कभी भाजपा और सपा के खेमे में सक्रिय रहे ब्राह्मण युवाओं को सम्मेलन की अहम जिम्मेदारी देकर, इसे सियासी समर का मजबूत आधार बनाने के संकेत भी दे दिए हैं। आपको बताते चलें कि सोनभद्र की चार विधानसभा क्षेत्र में से दो विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका में है, यही वजह है कि सोनभद्र में ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने के लिए सियासी पैंतरेबाजी सभी पार्टियों की तरफ से जारी है।फिलहाल जहाँ भाजपा अपना गढ़ बचाने की कोशिश की जद्दोजहद में लगी है वहीं दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियां ब्राह्मण मतदाताओं की नाराजगी व सत्ता से नाराजगी के सहारे अपनी नैया पार लगाने के लिए कोई स्वाभिमान रैली कर रहा है तो कोई ब्राह्मण महापुरुषों की मूर्ति लगवाने की घोषणा।

विपक्षी दलों द्वारा रोजगार व महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी। मौजूदा समय जहां महंगाई बड़ा मुद्दा बना हुआ है वहीं रोजगार के मसले पर सपा, बसपा व कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दल भाजपा सरकार को घेरने में लगे हुए हैं। इसमें रोजगार का मामला कुछ ज्यादा ही गरमाया हुआ है। सपा बसपा और कांग्रेस जहां राज्य सरकार को रोजगार के मसले पर फेल बताकर घेरने में लगे हुए हैं। वहीं भाजपा सरकार ने पूरे प्रदेश में विभागवार रोजगार का आंकड़ा तलब कर मजबूत पलटवार की तैयारी शुरू कर दी है। शासन की तरफ से गत 27 जुलाई को राज्य के सभी विभागाध्यक्षों को जारी पत्र में अवगत कराया गया था कि उच्च स्तर पर रोजगार की समीक्षा होनी है।इसलिए सभी विभागाध्यक्ष अपने विभाग में दिए गए रोजगार के संबंध में वर्ष 2017 से अद्यतन स्थिति, अप्रैल 2012 से मार्च 2017 (सपा सरकार ) मई 2007 से मार्च 2012(बसपा सरकार) तक का आंकड़ा उपलब्ध करा दें। नाम न छापने की शर्त पर कई विभागाध्यक्ष ने बताया कि संबंधित जानकारी उन लोगों ने उसी दिन शासन को भेजवा दी है।

जिले पर सभी प्रमुख दलों की सियासी नजर। आपको बताते चलें कि वर्ष 2017 से अब तक भाजपा सरकार है इससे पहले अप्रैल 2012 से मार्च 2017 तक सपा की सरकार थी। वहीं मई 2007 से मार्च 2012 तक प्रदेश में बसपा की सरकार रही है। बताते हैं कि शासन की तरफ से इसी तरह कई और तुलनात्मक जानकारियां विभागों को पत्र जारी कर जुटाई जा रही हैं। इसको सत्तापक्ष जहां सरकारी कामकाज से जुड़ा रूटीन वर्क बता रहा है वहीं विपक्षी खेमे और राजनीतिक पंडितों के बीच इसके सियासी मतलब निकाले जाने लगे हैं। बता दें कि सोनभद्र की सीमाएं जहां चार राज्यों से सटी हुई हैं वहीं आदिवासी बहुल और देश के 112 विशेष चयनित जिलों में एक होने के कारण, जिले के हालात पर सभी प्रमुख दलों की सियासी नजर टिकी हुई है। सोनभद्र की राजनीति का असर इससे सटे कई प्रदेशों तक रहता है यही वजह है कि वर्तमान समय में सत्ता पक्ष जहां सोनभद्र की राजनीतिक परकोटे में अपनी मजबूत पकड़ को बनाये रखने की जद्दोजहद में लगा है वहीं विपक्षी दल भी ब्राह्मण मतदाताओं की नाराजगी व अपने बेस वोटरों की गणितीय जुगाड़ से चुनाव में जीत के मजबूत दावे पेश कर रहे हैं।

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