Monday, September 20, 2021
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तात्कालिक हितों से आगे

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संयुक्त राष्ट्र के अलग-अलग मंचों का उपयोग करने का सवाल हो या विभिन्न मित्र देशों से बातचीत का- भारत ने हर मौके का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने की कोशिश में किया है कि अफगानिस्तान दुनिया भर में तबाही फैलाने का नया केंद्र न बने और न ही वहां के नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन बिताने में कोई स्थायी बाधा खड़ी हो। कुछ हलकों से यह सवाल उठाया गया है कि भारत सरकार अफगानिस्तान के सवाल पर कुछ बोल क्यों नहीं रही। लेकिन यह समझे जाने की जरूरत है कि अफगानिस्तान में अभी घटनाक्रम बहुत तेजी से बदल रहा है और यह साफ नहीं हो रहा है कि वहां आखिरकार स्थितियां क्या आकार लेने वाली हैं।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के सत्र को संबोधित करते हुए भारत ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचा कि अफगानिस्तान में सुरक्षा और मानवाधिकार का कितना बड़ा मसला खड़ा हो रहा है। उसने हर हाल में यह सुनिश्चित करने की जरूरत बताई कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन अन्य देशों के खिलाफ न कर सकें। गौर करने की बात है कि जहां इस क्षेत्र के कुछ अन्य देश अपने नजरिए को अपने संकीर्ण और तात्कालिक हितों तक सीमित रखते हुए तालिबान से करीबी बनाने में लगे हुए हैं, वहीं भारत खुद को संयत रखते हुए न केवल अफगानिस्तान के घटनाक्रम पर बारीकी से नजर बनाए हुए है, बल्कि देश दुनिया की वृहत और दूरगामी चिंता को स्वर दे रहा है।

तालिबान ने अपनी तरफ से कुछ पदों पर नियुक्तियों की घोषणा जरूर की है, लेकिन सरकार अभी वहां बनी नहीं है। देखना होगा कि तालिबान अकेले अपनी सरकार घोषित करते हैं या हामिद करजई जैसी किसी शख्सियत को प्रमुख बनाते हुए अपने प्रभाव वाली सरकार बनाते हैं या विभिन्न समूहों को मिला-जुलाकर कोई संयुक्त राष्ट्रीय सरकार बनाई जाती है। इसके बाद ही संबंधित सरकार को लेकर कोई रुख कायम किया जा सकता है। फिलहाल पहली जरूरत यही है कि जो लोग वहां फंसे हुए हैं और निकल कर भारत आना चाहते हैं, उनके सुरक्षित निकल आने की व्यवस्था की जाए। यह काम लगातार किया जा रहा है।


यह भी अच्छी बात है कि सरकार ने गुरुवार को अफगानिस्तान के सवाल पर सर्वदलीय बैठक बुलाई है। अपने देश में विदेश नीति से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर राजनीतिक सर्वमान्यता की परंपरा रही है। इस परंपरा को कायम रखते हुए विपक्ष को विश्वास में लेने की सरकार की यह पहल सराहनीय है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सर्वदलीय बैठक से उभरीं भारत सरकार की नीतियां न केवल अफगानिस्तान को झंझावात के मौजूदा दौर से निकलने में मदद करेंगी बल्कि वहां की नई सरकार को भारत की चिंताओं का सम्मान करने को भी प्रेरित करेंगी।

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